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Friday, 22 September 2017
Friday, 15 September 2017
Sunday, 3 September 2017
इस ग्रेजुएट लड़की ने जीभ काट कर देवी मंदिर में चढ़ा दी,अन्धविश्वाश या हकीकत
इस ग्रेजुएट लड़की ने जीभ काट कर देवी मंदिर में चढ़ा दी,अन्धविश्वाश या हकीकत
हेल्प इंडिया ।सपने आप भी देखते होंगे कि भगवान आपसे कुछ कह रहे हैं। मैं भी कई बार देखता हूं, लेकिन कभी ऐसा नहीं करता, जो इस लड़की ने किया। क्योंकि भगवान या अल्लाह को इन चीजों की भला क्या जरूरत। एक 19 साल की लड़की। वो भी ग्रैजुएशन की स्टूडेंट है। उसने देवी मां काली को अपनी जीभ काटकर भेंट कर दी. वो भी देवी को खुश करने के लिए। ऐसी खबर है सुनके भी दिमाग सुन्न हो जाए. ये सब हुआ है मध्य प्रदेश के रीवा शहर के काली मंदिर में।आरती दुबे उम्र 19 साल के है और अंडर ग्रैजुएट स्टूडेंट है। टीआरएस कॉलेज में एक रात वो ख्वाब में देखती है कि देवी काली उससे जीभ मांग रही हैं। वो भी उसकी सारी विश पूरी करने के लिए आरती ख्वाब में देखते ही अपनी जीभ देने का फैसला कर लेती है। और सज-धज के पहुंच जाती है रानी तालाब मंदिर। गले में फूलों की माला डालकर ,मंदिर में मौजूद लोग काली के जयकारे लगाते हैं,और आरती अपनी जीभ काट देती है। आरती के भाई सचिन ने बताया, आरती ने मुझे अपने सपने के बारे में बताया था । उसने मुझसे कहा कि वो अपनी जीभ देवी काली को भेंट करने जा रही है। जब उसने मुझसे ये कहा, तो बिलकुल भी वो मुझे सीरियस नहीं लगी। मैंने सोचा वो मजाक कर रही है। रानी तालाब मंदिर में जब आरती अपनी जीभ काटती है, तो कुछ ही देर में वो बेहोश हो जाती है। मंदिर में लोगों की भीड़ जुट जाती है। लोग और मंदिर के पुजारी बेहोश आरती के ऊपर एक चुन्नी डाल देते हैं। उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जाया जाता बल्कि उसके ठीक होने के लिए प्रार्थना करने लगते हैं। पांच घंटे बाद आरती होश में आती है। लोग उस पर भगवान का आशीर्वाद होने की बात करते हैं।
मंदिर के पुजारी देवी प्रसाद शर्मा कहते हैं कि जब आरती ने जीभ भेंट की, तो वो मौके पर ही मौजूद थे। उन्होंने कहा कि देवी सबकी मदद करती हैं। वो अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। जब ये खबर इलाके में फैलती है तो डॉक्टर और पुलिस वहां पहुंचती है। डॉक्टर आरती की मरहम-पट्टी करते है और घर भेज देते हैं।
आरती एक अकेली ऐसी लड़की नहीं हैं, जिसने अपने बॉडी पार्ट को भगवान को भेंट किया हो। इससे पहले भी कई लोग अपने बॉडी पार्ट को भगवान को खुश करने के लिए काटते रहे हैं। लोगों का अंधविश्वास उनसे उनके बॉडी पार्ट छीन लेता है।एक पढ़ी-लिखी लड़की का जीभ काट लेना सोसाइटी के लिए खतरनाक है।जो अंधविश्वास को बढ़ावा देता है।
Saturday, 26 August 2017
इस फल के बारे में जानकर हो जायेंगे हैरान,बवासीर की है अचूक औषधि
इस फल के बारे में जानकर हो जायेंगे हैरान,बवासीर की है अचूक औषधि
हेल्प इंडिया समाचार।जिमीकंद एक बहुवर्षीय भूमिगत सब्जी है जिसका वर्णन भारतीय धर्मग्रंथों में भी पाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों में जिमीकंद के भिन्न-भिन्न नाम ओल या सूरन हैं। पहले इसे गृहवाटिका में या घरों के अगल-बगल की जमीन में ही उगाया जाता था। परन्तु अब तो जिमीकंद की व्यवसायिक खेती होने लगी है। जिमीकंद एक सब्जी ही नहीं वरन यह एक बहुमूल्य जड़ीबूटी है जो सभी को स्वस्थ एवं निरोग रखने में मदद करता है।भोज्य पदार्थों के संचन हेतु यह भूमिगत तना का रूपांतर है जिसे घनकंद कहते हैं। यह परिवर्तित तना बहुत अधिक जैसा-तैसा फूला रहता है एवं इसकी सतह पर पर्वसंधियाँ रहती हैं, जिनपर शल्क-पत्र लगे रहते हैं। सतह पर जहाँ-तहाँ अपस्थानिक जड़ें लगी रहती हैं। अगले सिरे पर अग्रकलिका तथा शल्कपत्रों के अक्ष पर छोटी-छोटी कलिकाएँ होती हैं। इस पौधे का फल यानी जड को बवासीर के दवा मे भी उपयोग किया जाता है |
Tuesday, 8 August 2017
चोटी कटने की काफी खोजने पर सामने आयी दहशत भरी सच्चाई
चोटी कटने की काफी खोजने पर सामने आयी दहशत भरी सच्चाई
हेल्प इंडिया समाचार। दोस्तों मै दावे की साथ कहता हूँ कि चोटी कटने की सच्चाई ये है कि ये सिर्फ कोरी अफवाह है। मेरे सबसे निवेदन है कि ऐसी अफवाहों को न ही वढावा दे ,और न ही विशवास करें। अब मै आप को बताता हूँ सच्चाई ,मै काफी दिनों से चोटी कटने की घटनाओं से परेशान था ,जिस तरफ देखो हवा की तरह फैल रही ये अफवाह ,घरों में माताओं ,बहनों में दहशत का माहौल पैदा कर रहा था।हालांकि मैंने शुरुआत से इसे अफवाह ही बताया ,मगर लोगों का डर के कारण मेरी बातों पर विश्वाश ही नहीं होता। मगर जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने भी ठान ली और निकल पड़ा सच्चाई की तलाश में। पहले तो मैंने जिन महिलों की चोटी कट रही थी उनके पडौसियों से पूंछा और काफी मशक्कत करने के बाद मुझे एक वह महिला मिली जिसकी चोटी कटी थी। मेरे पूछने पर पहले तो उस महिला ने यही बताया कि मै सो रहीं थीं और जब मै सुबह जागीं तो मेरी चोटी कटी मिली थी ,जिसे देखते ही मैं बेहोश हो गईं थी। मै उसकी बातों से ही समझ गया कि सच्चाई इसकी बातों से लाखों कदम दूर है ,मगर जब मैंने उसके जख्मों को और कुरेदा तब जो सच्चाई सामने आई वो बहुत ही डरावनी थी। महिला ने बताया कि उस दिन मेरे पती ने बहुत पीता था ,मैंने जीने की उम्मीद त्याग कर आत्महत्या करने की कोशिश की मगर उसमे भी पकडे गई।
जब घर वाले पूरी तरह से डर गए कि मै अपनी जान दे दूंगी ,तो उसी रात मेरे पति द्वारा मेरी चोटी काट ली गयी ,जिसे देखते ही मै वेहोश हो गईं। इसके अलाबा मै उन औरतों से तो नहीं मिल पाया मगर उनके पडौसियों से पूंछा तो ऐसी कोई महिला नहीं निकली जो पीड़ित न हो या फिर इस समय पीड़ित न की जा रही हो। मै इसको अफवाह मानता हूँ और सरकार से एक बार फिर आग्रह करता हूँ कि इन मामलों की जाँच उन्ही महिलाओं के घर से की जाय जिनकी चोटी कटीं है। चोटी काटने वाला जल्द ही आप के पकड़ में होगा।
Saturday, 5 August 2017
दहशत बना दरिंदा नहीं रुक रहीं चोटी कटने की घटनाएँ महिलाओं में बना खौफ
दहशत बना दरिंदा नहीं रुक रहीं चोटी कटने की घटनाएँ महिलाओं में बना खौफ
हेल्प इंडिया समाचार। दोस्तों मेरी समझ में नहीं आ रहा ,आखिर ये सब हो क्या रहा है। अभी तक रात में चोटी कटने की सूचनाएँ आ राहें थी। अब दिन में भी चोटी काटी जा रहीं है। पुलिस अपना काम कर रही है ,मगर आज तक कोई सुराग नहीं जुटा पाई ,आखिर ये सब हो क्या रहा है। आज तक उत्तर प्रदेश में 100 ,हरियाणा में २६, दिल्ली में ७,और पंजाब में 5 घटनाएँ सामने आ चुकीं है।आखिर क्यों नहीं पता कर पा रही है चोटी कटने का रहष्य। कल उत्तर प्रदेश में हरदोई के कुतुबापुर में जय राम यादव की बेटी रामलली उम्र 18 वर्ष के रात आठ बजे , कुतुबापुर में ही राजेश की बेटी नीलम जिसकी उम्र 17 वर्ष है के बाल काटे गए दोनों लड़कियां अस्पताल में भर्ती हैं। बेहता चऊपुर के रमाकांत मिश्र की पत्नी रन्नो देवी उम्र 42 वर्ष की रात में सोते समय उसी गाँव के विजय कुमार की पत्नी रूबी उम्र 32 वर्ष की दोपहर में ,मवैया निवासी खुदाबक्स की शाहनाज उम्र 42 वर्ष की रात में ,अख्तियारपुर निवासी दिलीप की पत्नी लल्ली उम्र 35 वर्ष चार बजे दिन में ,चंदौली निवासी ईश्वर चन्द की बेटी मोहनी उम्र 19 वर्ष सुबह 10 बजे चोटियाँ काटीं गईं ,और सभी महिलाएं अस्पतालों में भर्ती है।,और सभी का इलाज चल रहा है।
कौन है जो ऐसी दरिन्दगी फैला रहा है और इन मासूम महिलाओं को शिकार बना रहा है। सरकार इसको अफवाह मान रही है ,अंधविश्वास के मै भी खिलाफ हूँ ,मगर कुछ तो है जो इन घटनाओं को अंजाम दे रहा है। कोई दरिंदा भी हो सकता है जो महिलाओं के मन में दहशत भरना चाहता हो ,मगर सबाल ये उठता है कि आखिर क्यों ,क्यों किया जा रहा है महिलाओं का उत्पीड़न। एक तरफ मै यह भी सोचता हूँ कि महिलाये अपनी चोटी अपने आप काट रहीं है ,तो वे वेहोश होकर अस्पताल क्यों पहुँच रहीं है। मुझे तो इसमें कोई बहुत बड़ा साजिस नजर आती है ,मगर सबाल उठता है किस दरिन्दे की ,इसका राज एक न एक दिन जरूर खुलेगा। मेरी महिलाओं से अपील है कि वे अपने आप को सम्हालें चोटी काटने वाले से डरने की नहीं लड़ने की जरूरत है।
Friday, 4 August 2017
दुनिया का सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी प्राणी जिसके बारे में जानकर आप हो जायेगे हैरान
दुनिया का सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी प्राणी जिसके बारे में जानकर आप हो जायेगे हैरान
दुनिया का सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी प्राणी में एक लॉक नेस मोंस्टर जो नेस्सी के नाम से मशहूर है, दुनिया के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। नेस्सी को सैकड़ो लोग देखने का दावा करते है और इसकी कई तस्वीरे भी प्रसिद्ध है जिनके ऊपर काफी रिसर्च भी की गयी है।
आप जब भी दुनिया के रहस्यों के बारे में जानने का प्रयास करोगे उन सबमे नेस्सी भी जरूर होगा। लगभग सभी चैनल इसके ऊपर कार्यक्रम बना चुके है और सैकड़ो लोग इसे ढूंढने के लिए अथाह पैसा और समय बर्बाद कर चुके है लेकिन उनके हाथ सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है, लेकिन अभी भी लोग इसे देखे जाने का दावा करते है और उनके अनुसार यह सच है।जिन लोगो ने इसे देखा है उनके अनुसार इस जानवर की गर्दन लम्बी है, पीठ एक कूबड़ की तरह और चेहरा घोड़े जैसा है। इसे पानी से बहार कभी भी नहीं देखा गया और इससे अनुमान लगाया जाता है की यह पूरी तरह से जलीय जीव है।
Sunday, 30 July 2017
इस मंदिर में प्रवेश करते ही इंसान से दूर सदा के लिए भाग जाती है प्रेत आत्माएं
इस मंदिर में प्रवेश करते ही इंसान से दूर सदा के लिए भाग जाती है प्रेत आत्माएं
गुजरात के सौराष्ट्र स्थित सारंगपुर गांव के कष्टभंजन हनुमान के दर्शन मात्र से ही किसी भी जातक की भूत, प्रेत, ब्रह्मराक्षस बाधा तुरंत दूर हो जाती है। सारंगपुर के कष्टभंजन हनुमान के इस धाम को पीड़ित जनों का उद्धार स्थल कहा जाता है। यहां हर जाति, धर्म के लोग आते हैं। कहा जाता है कि भूत-प्रेत-पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस से पीड़ित व्यक्ति पर यहां का पुजारी जैसे ही मंत्र बोलकर जल छिड़कता है वैसे ही मानव शरीर को जकड़ी बुरी आत्मा सामने आ जाती है।कौन है। कहां से आए हो। इसे क्यों परेशान कर रहे हो। क्या चाहते हो? आदि बातें पुजारी उस आत्मा से करता है। कभी-कभी ये बुरी आत्माएं चौंकाने वाली कहानियां भी बताती हैं। पहले तो ये पीड़ित को नहीं छोडऩे का हठ करती हैं लेकिन जैसे ही उन्हें स्वामी गोपालानंद की छड़ी दिखाई जाती है, वैसे ही वे चीखने-चिल्लाने लगती हैं और फिर उस व्यक्ति को कभी परेशान न करने का वचन देकर वहां से भाग खड़ी होती हैं। मनुष्य तन से बुरी आत्मा के दूर होते ही वह पूर्ण स्वस्थ हो जाता है, ऐसा लोगों को विश्वास है। इस तरह का दृश्य इस मंदिर में प्रत्येक शनिवार एवं मंगलवार को देखने को मिलता है, जहां हजारों श्रद्धालु कष्टभंजनदेव का दर्शन कर अपने विविध कष्टों से निजात पाते हैं।सारंगपुर के विषय में कहा जाता है कि रामायण काल में जब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता जी को खोजते-खोजते किष्किंधा पहुंचे तो वहां उनकी मुलाकात हनुमान जी से हुई। हनुमान जी ने उन्हें सुग्रीव से मिलवाया। बाली का वध हुआ। सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने। राजा सुग्रीव ने अपने सचिवों हनुमान जी, नल, नील, जामवंत, अंगद आदि को बुलाकर कहा कि वन प्रदेशों में जाकर वानर सेना को इकट्ठा करो। हनुमान जी को पश्चिम दिशा की ओर भेजा गया।उस समय रैवताचल पर्वत के वन प्रदेश में वानरों की संख्या अधिक थी। हनुमान जी वहां मांडव्य ऋषि के आश्रम में रुके। यहां सारंग मृग, कालियार मृग, मोर तथा विविध पक्षियों के कलरव, नयनरम्य मनोहर स्थान को देखकर हनुमान जी मंत्र मुग्ध हो गए। किष्किंधा पहुंचकर हनुमान जी ने भगवान राम से इस वन प्रदेश की सुंदरता का जब वर्णन किया तभी भगवान राम के मुख से निकला कि भविष्य में आप वहां निवास कर पीड़ितों के कष्ट दूर करेंगे।युग बदला। कलियुग आया। इसके साथ ही अयोध्या के सूर्यवंशी रघुवंशी राजाओं की समृद्धि भी घटने लगी। अवधपुरी में आततायियों का प्रभाव बढऩे लगा। तीर्थस्थल की पवित्रता दूषित होने लगी। समय को देखते हुए वहां के सूर्यवंशियों ने मारवाड़ में आकर सूर्यनारायण का मंदिर बनाया तथा उनकी पूजा करने लगे।मार्तंड यानी सूर्य की पूजा करने वाले वृद्ध पुजारी जिसे लोग ‘दादा’ कहते थे, का नियम था कि जब तक वे भगवान की पूजा नहीं कर लेते तब तक अन्न-जल ग्रहण भी नहीं करते थे। वहां अकाल पड़ गया और कई वर्ष तक बारिश नहीं हुई। लोग जल की खोज में गुजरात की ओर निकले।दादा भी सूर्यनारायण की मूर्त को एक रथ में रखकर उनके साथ चले। चलते-चलते उनके रथ का एक पहिया मिट्टी में धंस गया। बहुत कोशिश हुई पर पहिया नहीं निकला। उसी रात सूर्य भगवान ने उन्हें स्वप्र में दर्शन देकर कहा कि यहीं विश्राम करो। इस क्षेत्र में एक दिन पूर्ण पुरुषोत्तम नारायण आएंगे और सूर्यवंशियों का कल्याण करेंगे। मार्तंडराय के नाम पर स्थापित सूर्य मंदिर को मांडवराय कहा जाने लगा। सूर्यभक्त दादा के वंशज कारियाणी, लोया, बोराद, नागकड़ा आदि गांवों में बस गए। स्वामी नारायण सम्प्रदाय के स्वामी गोपालानंद जी महाराज ने अपनी तपस्या से हनुमान जी को प्रसन्न कर उनसे सारंगपुर में निवास करने का आग्रह किया।1905 में कष्टभंजन हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा हुई। तभी से यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त अपने कष्टों के निवारण के लिए कष्टभंजन देव का दर्शन करने के लिए देश-विदेश से आते हैं। यहां सुरेन्द्र नगर स्टेशन से बोराद के लिए ट्रेन से या सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
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Saturday, 29 July 2017
दुनिया का सबसे बड़ा और सड़े मांस की तरह बदबू देने वाला फूल
दुनिया का सबसे बड़ा और सड़े मांस की तरह बदबू देने वाला फूल
हेल्प इंडिया समाचार।दोस्तों आज मै बात करूंगा दुनियां के सबसे बड़े और सबसे बदबूदार फूल की।केरल एक बहुत ही मन मोहक जगह है। मानसून में यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है।
इस मौसम में यहां हर तरफ हरियाली सभी का मन मोह लेती है। इसके अलावा केरल की खूबसूरती को चार-चांद लगाने वाला आर्किड गार्डेन है जो केरल की सुंदरता को दुगुना कर देता है। इसके खिलते हुए नजारे को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते है। इसमें एमोर्फोफैलस टाइटेनम नाम का एक फूल रहता है।ये फूल देखने में बेमिसाल होता है और 9 साल बाद खिलता है। इसको एमोर्फोफैलस टाइटेन का फूल कहते हैं। इस फूल की खासियत है कि ये रात ही में खिलता है और खिलने के 48 घंटे तक ही जीवित रह सकता है।इसकी सुंदरता के देखने के लिए लोग यहां दूर-दूर से आते है। ये फूल जितना खूबसूरत है उतना ही दुर्लभ भी, ये फूल सिर्फ इंडोनेशिया के जंगलों में ही पाया जाता है।एक हफ्ते तक खिलने वाला ये फूल देखने में जितना सुंदर होता है, इसकी महक उतनी ही खराब बदबूदार होती है।यह फूल सड़े हुए मांस की तरह बदबू देता है । खिलने के समय ये 3 मीटर तक ऊंचा हो जाता है।
क्या है इस 9550 वर्ष पुराने पेड़ का रहष्य आइये जानते हैं विस्तार से
क्या है इस 9550 वर्ष पुराने पेड़ का रहष्य आइये जानते हैं विस्तार से
हेल्प इंडिया समाचार। दोस्तों आपने बहुत से पेड़ देखें या सुने होंगे मगर मै आपको जिस पेड़ के बारे में बताने जा रहा हूँ उससे आप आश्चर्यचकितजरूर होंगे ।प्रसरल या सिर्फ़ सरल अंग्रेज़ी में इसे spruce, स्प्रूस एक कोणधारी वृक्ष कहते है, जो दुनिया के उत्तरी गोलार्ध हॅमिस्फ़ीयर के ठन्डे इलाक़ों में मिलता है। यह 20 से 60 मीटर (65 से 200 फ़ुट) तक के ऊँचे पेड़ होते हैं और अपने कोण जैसे आकार और सर्पिल (स्पाइरल) तरह से सुसज्जित तीली जैसे पत्तों से आसानी से पहचाने जाते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में यह हिमालय के क्षेत्र में पाए जाते हैं। प्रसरल एक लम्बी आयु जीने वाला दरख़्त है और उत्तरी यूरोप के स्कैंडिनेविया इलाक़े के पश्चिमी स्वीडन क्षेत्र में एक 'ओल्ड त्यिक्को' (Old Tjikko) नामक सरलवृक्ष मिला है जिसकी उम्र 9,550 वर्ष बताई गई है, हालांकि इसपर कुछ विवाद है।
Thursday, 20 July 2017
हैरत में डालने वाला बथुआ का पेड़ पढ़ें पूरा रहष्य
नमस्कार दोस्तों ,आज मै आप लोगों को हेल्प इंडिया के माध्यम से एक ऐसी खबर बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर आप भी थोडा हैरान हो सकते है।
मैंने जो अपनी आँखों से देखा उसके बारे में बताऊंगा। आपने बथुआ का तो सेवन जरूर किया होगा इसका वानस्पतिक नाम चेनोपोडियम अल्बम है।
इसकी अधिकतम लम्बाई पांच से वीस सेमी तक होती है। ये छोटा-सा दिखने वाला हराभरा पौधा काफी फायदेमंद है, सर्दियों में इसका सेवन कई बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है।
बथुए में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, बथुआ न सिर्फ पाचनशक्ति बढ़ाता बल्कि अन्य कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाता है।बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है।
बैसे तो ये रवी सीजन का एक खरपतवार है ,मगर इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के भोजन में प्रयोग जिया जाता है। मगर आज मै जिस बथुआ के पेड़ की बात कर रहा हूँ ,वो है ही अजीव इसकी लम्बी लगभग 15 से 20 फिट है। ये बथुआ का पेड़ जनपद हरदोई से लगभग 7 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम भिठारी के मजरा बगहा में है। पहले नज़र में तो मैंने भी इसे देख कर विशवास नहीं किया ,मगर जब मैंने वास्तविक रूप से निरीक्षण किया तो मैंने पाया कि ये तो वास्तव में बथुआ का ही पेड़ है।
ये पौधा दो वर्ष पहले सत्यपाल पुत्र मैकू ने अपने घर के पास लगाया था। सत्यपाल ने बातचीत में बताया कि इसका प्रयोग तमाम औषधियों में किया जाता है ,और सर्दियों के अलाबा इसे अन्य सीजन में ढूँढना नामुमकिन है ,इसी कारण इसे इतना बड़ा किया गया है ,और इसकी उपलब्धता हर समय रहती है। गांव वालों ने ये भी बताया कि इस बथुआ के पेड़ को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं।
Sunday, 16 July 2017
राष्ट्रपति चुनाव २०१७, आइए जानते है राष्ट्रपति भवन का इतिहास
राष्ट्रपति चुनाव २०१७, आइए जानते है राष्ट्रपति भवन का इतिहास
राष्ट्रपति भवन भारत सरकार के राष्ट्रपति का सरकारी आवास है। सन १९५० तक इसे वाइसरॉय हाउस बोला जाता था। तब यह तत्कालीन भारत के गवर्नर जनरल का आवास हुआ करता था। यह नई दिल्ली के हृदय क्षेत्र में स्थित है। इस महल में ३४० कक्ष हैं और यह विश्व में किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के आवास से बड़ा है। वर्तमान भारत के राष्ट्रपति, उन कक्षों में नहीं रहते, जहां वाइसरॉय रहते थे, बल्कि वे अतिथि-कक्ष में रहते हैं। भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल श्री सी राजगोपालाचार्य को यहां का मुख्य शयन कक्ष, अपनी विनीत नम्र रुचियों के कारण, अति आडंबर पूर्ण लगा जिसके कारण उन्होंने अतिथि कक्ष में रहना उचित समझा। उनके उपरांत सभी राष्ट्रपतियों ने यही परंपरा निभाई। यहां के मुगल उद्यान की गुलाब वाटिका में अनेक प्रकार के गुलाब लगे हैं और यह कि जन साधारण हेतु, प्रति वर्ष फरवरी माह के दौरान खुलती है। इस भवन की खास बात है कि इस भवन के निर्माण में लोहे का नगण्य प्रयोग हुआ है।अभिकल्पना
दिल्ली दरबार के वर्ष १९११ में भारत की राजधानी को तत्कालीन कोलकत्ता से स्थानांतरित कर दिल्ली लाने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय १२ दिसंबर को जॉर्ज पंचम द्वारा घोषित किया गया। इस योजना के तहत गवर्नर जनरल के आवास को प्रधान और अतीव विशेष दर्जा दिया गया। ब्रिटिश वास्तुकार सर एड्विन लैंडसियर लूट्यन्स को, जो कि नगर योजना के प्रमुख सदस्य थे, इस इमारत स्थल की अभिकल्पना का कार्यभार सौंपा गया। इसके मूल योजना के अनुसार, कुछ ऐसा बनाना था, जो कि पूर्वीय और पाश्चात्य शैली का मिश्रण हो। कुछ लोगों की राय में यह महल परंपरागत शैली का होना चाहिये था, जो कि प्राचीन यूनानी शैली में होता। लेकिन यह भारत में स्पष्टतः पाश्चात्य शक्ति प्रदर्शन होता, जो कि अमान्य था। वहीं दूसरी ओर कई लोगों का मत था, कि यह पूर्णातया भारतीय शैली का हो। इन दोनों के मिश्रण के कई अनुपात भी प्रस्तावित थे। तब वाइसरॉय ने कहा, कि महल परंपरागत होगा, परंतु भारतीय मोटिफ के बिना। यही वह अभिकल्पना थी, जो कि मूर्त रूप में आज खड़ी है। यह महल लगभग उसी रूप में बना, जो कि लूट्यन्स ने बेकर को शिमला से १४ जून १९१२ को भेजा था। लूट्यन्स की अभिकल्पना वृहत रूप से परंपरागत थी, जो कि भारतीय वास्तुकला से वर्णमेल, ब्यौरे, इत्यादि में अत्यधिक प्रेरित थी, साथ ही वाइसरॉय के आदेश के अनुसार भी थी। लूट्यन्स और बेकर, जिन्हें वाइसरॉय हाउस और सचिवालयों का कार्य सौंपा गया, उन्होंने आरम्भ में काफी सौहार्द से कार्य किया, लेकिन बाद में झगड़े भी। बेकर को इस भवन के आगे बने दो सचिवालयों की योजना का कार्य दिया गया था। आरम्भिक योजनानुसार वाइसरॉय हाउस को रायसिना की पहाड़ी के ऊपर बना कर दोनों सचिवालय नीचे बनाने थे।बाद में सचिवालयों को ४०० गज पीछे खिसकाकर पहाड़ी पर ही बनाना तय हुआ। लूट्यन्स की योजनानुसार यह भवन अकेला ऊंचाई पर स्थित होता, जिसे कि सचिवालयों के कारण अपने मूलयोजना से पीछे सरकना पड़ा, साथ ही आगे दोनों सचिवालय खाड़े हो गये, जिससे कि वह दृष्टि में कूछ दब गया। यही उनके विवाद का कारण था। इस महल के पूर्ण होने पर लूट्यन्स ने बेकर से अच्छी लड़ाई की, क्योंकि यकीनन वाइसरॉय हाउस का दृश्य, सड़क के उच्च कोण के कारण बाधित हो गया था। लूट्यन्स ने इस विवाद को बेकरलू (वाटरलू के युद्ध के सन्दर्भ में) के स्तर का माना। लेकिन भरपूर प्रयास के बावजूद इसे बदलवा नहीं पाया। वह चाहता था, कि भवन से नीचे तक एक लम्बी ढ़ाल पर सड़क आये, जिससे कि भवन का दृश्य ना बाधित हो, एवं दूर से भी दृश्य हो। सन १९१४ में बेकर और लूट्यन्स सहित बनी एक समिति मं तय हुआ, कि सड़क की ढ़ाल २५ में १ हो, जो बाद में केवल २२ में १ बनी। इससे अधिक खड़ी ढ़ाल भवन के दॄश्य को और बाधित करती। लूट्यन्स यह जानता था, कि यह ढ़ाल भी इसके दृश्य को पूर्णतया नहीं दिखा पायेगी। तब उसने इसे कम कराने का निवेदन किया। सन १९१६ में इम्पीरियल दिल्ली समिति ने लूट्यन्स के इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। लूट्यन्स ने तब भी यही समझा कि बेकर सरकार को खुश करके और पैसे बनाने में अधिक लगा था, ना कि अच्छी श्रेणी की वास्तु रूपांकन में ध्यान केद्रित करने में। लूट्यन्स ने भारत और इंगलैंड की बाइस वर्षों में लगभग प्रतिवर्ष यात्रा की, दोनों स्थानों की वाइसरॉय इमारत बनाने हेतु। उसे लॉर्ड हार्डिंग के बजट नियंत्रण के कारण इमारत के आकार को कई गुणा छोटा भी करना पड़ा। लॉर्ड हार्डिंग ने यद्यपि खर्चे नियंत्रित कर कीमत घटाने के निर्देश दिये थे। तथापि वह चाहते थे, कि कूछ निश्चित मात्रा में तो इमारत में वैभव दर्शन हों ही।
भारतीय रूपांकन
इमारत के ऊपर भारतीय स्थापत्यकला का एक अभिन्न अंग है छोटे गुम्बदनुमा ढांचे - छतरी। इमारत में विभिन्न भारतीय डिज़ाइन डाले और जोड़े गये। इनमें ढेरों गोलाकार परात/कुण्ड रूपी घेरे हैं (चित्रित), जो कि भवन के ऊपर लगे हैं और जिनमें पानी के फौव्वारे भी लगे हैं, वे भारतीय स्थापत्य के अभिन्न अंग हैं। यहां परंपरागत बारतीय छज्जे भी हैं, जो कि आठ फीट दीवार से बाहर को निकले हुए हैं और नीचे पुष्पाकृति से सम्पन्न हैं। ये भवन को सीधी धूप के खिड़कियों में पड़ने से और मानसून में वर्षा के जल और फुहार को जाने से रोकते हैं। छत के ऊपर बनीं कई छतरियां, बवन की छत के उस भाग को, जहां मुख्य गुम्बद नहीं बना है, वहां के सपाट दृश्य होने से रोकतीं हैं। लूट्यन्स ने कई भारतीय शैली के नमूनों को उपयुक्त स्थानों पर प्रयुक्त किया है, जो कि काफी प्रभावशाली हैं। इनमें से कुछ हैं, बाग में बने नाग, स्तंभों पर बने सजे धजे हाथी (चित्रित) और छोटे खम्भों पर लगे हुए बैठे हुए सिंह (चित्रित)। ब्रिटिष शिल्पकार चार्ल्स सार्जियेन्ट जैगर, जो कि अपने बनाये कई युद्ध स्मारकों के लिये जाने जाते हैं, ने बाहरी दीवारों पर बने हाथियों की सजावट की थी।इसके साथ ही जयपुर स्तंभ के निकट का पूर्ण बास रिलीफ भी उन्हीं ने बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर से बनी जालियां भी भारतीय स्थापत्य से प्रेरित थीं। भवन के आगे की ओर, पूर्वी ओर, बारह असमान स्थित स्तंभ हैं, जिनपर ऊपर की ओर, खड़ी रेखाओं का बॉर्डर है और अकैन्थस की पत्तियों सहित बेक बनी है, जिसके संग चार पैन्डेन्ट रूप में घंटी बनी है, जो कि भारतीय हिन्दू धर्म के मंदिरों का एक अनिवार्य अंग हैं। प्रत्येक स्तंभ के प्रत्येक ऊपरी कोण पर एक घंटी बनी है। यह कथित था, कि क्योंकि ये घंटियां शांत हैं, इसलिये भारत में ब्रिटिश राज्य समाप्त नहीं होगा। प्रासाद के सामने की ओर कोई खिड़की नहीं है, सिवाय किनारों की ओर बनी हुई वाली के। लूट्यन्स ने भवन में कुछ व्यक्तिगत प्रभाव भी डाले हैं, जैसे कि उद्यान की दीवार में एक स्थान और स्टेट कक्ष में दो रोशनदान, जो कि चश्में जैसे प्रतीत होते हैं।
यह भवन मुख्यतः १९२९ में, बाकी नई दिल्ली के साथ ही, पूर्ण हो गया था और इसका आधिकारिक उद्घाटन सन १९३१ में हुआ था। यह एक रोचक तथ्य है, कि यह भवन सत्रह वर्शःओं में पूर्ण हुआ और सत्रह वर्ष ही ब्रिटिश राज्य में रह पाया,। अपने निर्माण पूर्ण होने के अठ्ठारहवें वर्ष ही, यह स्वतंत्र भारत में आ गया। १९४७ में, भारतीय स्वतंत्रता के बाद, तत्कालीन वाइसरॉय वहां रहते रहे और अंततः १९५० में भारतीय गणतंत्रता के बाद से यहां भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति रहने लगे और इसका नाम बदल कर राष्ट्रपति भवन हो गया। इसका गुम्बद, लूट्यन्स के अनुसार रोमन पैन्थेयन से प्रेरित बताया गया था। वैसे यह मूलतः मौर्य काल में बने सांची स्तूप, सांची, मध्य प्रदेश से व्युत्पन्न है। यहां यूरोपियाई और मुगल स्थापत्यकला के घटक भी हैं। सम्पूर्णतः यह भवन अन्य ब्रिटिश इमारतों से एकदम भिन्न है। इसमें ३५५ सुसज्जित कक्ष हैं। इसका भूक्षेत्र फल २,००,००० वर्ग फीट (१९००० वर्ग मीटर) है। इस भवन में ७०० मिलियन ईंटें अओर ३.५ मिलियन घन फीट (८५००० घन मीटर) पत्थर लगा है, जिसके साथ लोहे का न्यूनतम प्रयोग हुआ है।
खाका
प्रासाद का खाका, एक वृहत वर्ग से बनाया गया है। यद्यपि यहां अनेकों आंगन और अंदरूनी खुले क्षेत्र हैं। यहां वाइसरॉय के लिये पृथक स्कंध है और अभ्यागतों के लिये पृथक स्कंध है। वाइसरॉय स्कंध अपने आप में, एक अलग चार मंजिला मकान है, जिसमें अपने स्वयं के आंगन हैं। यह इतना बड़ा है, कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद ने यहां ना रहकर, पाहुना स्कंध में रहना पसंद किया। यही परंपरा उनके उत्तराधिकारियों द्वारा भी अनुगमित हुई। प्रासाद के मुख्य भाग के केन्द्र में, मुख्य गुम्बद के ठीक नीचे है – दरबार हॉल, जिसे ब्रिटिश काल में राजगद्दी कक्ष कहा जाता था। तब यहां वाइसरॉय और उनकी पत्नी के लिये राजगद्दियां होती थीं। इस कक्ष का अंतस अनलंकृत है, जो कि यहां के पाषाण नक्काशी को, बजाय पेचीदा सजावट के, उजागर करने हेतु किया गया है। ऐसे ही अधिकांश कक्षों में किया गया है।यहां के स्तंभ भी बाहर के मुख्य स्तंभों की भांति ही, ऊपर घंटी और खड़ी रेखाओं वाले बॉर्डर सहित हैं। दीवारों के ऊपर यही बॉर्डर भी हैं। कक्ष के बीच में एक दो टन भार का झाड़-फानूस (शैन्डेलियर) लगा है, जो कि ३३ मीटर ऊंची छत से लटकता है। इस विशाल कक्ष के चारों कोणों पर स्थित है एक कक्ष प्रति कोण। इनमें से दो स्टेट ड्रॉविंग कक्ष हैं, एक स्टेट अपर कक्ष और एक स्टेट पुस्तकालय हैं। अन्य कक्ष गलियारे जैसे भी हैं, जो कि एक ओरखुले हैं। ये नीचे आंगन में खुलते हैं। एक वृहत भोजन कक्ष, बैठक कक्ष, बिलियर्ड्स कक्ष और एक बड़ा बॉल कक्ष और कई जीने हैं। प्रासाद में सर्वत्र कई स्थानों पर जल के फव्वारे और बेसिन बने हैं, जिनमें से कुछ वाइसरॉय के आसन की सीध्इयों के पास भी हैं। इनमें आठ संगमर्मर के शेर छः जल बेसिनों में पानी डालते हुए बने हैं। यह सिंह ब्रिटेन के सूचक थे। इनमें से एक कक्ष की खुली छत भी है, जो कि प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक प्रकाश देती है।
मुगल उद्यान
जयपुर स्तंभ
गुम्बद
यह पूरे भवन की ऊंचाई की दुगुनी ऊंचाई का है। सन १९१३ के भवन की योजना में जो इसकी ऊंचाई थी, उसे लॉर्ड हार्डिंग द्वारा बढ़ाया गया था। इस गुम्बद में परंपरागत और भारतीय शैलियों का मिश्रण है। लूट्यन्स के अनुसार, यह रूप रोम के पैन्थियन से उभरा है, लेकिन यह भी बहुत सम्भव है, कि इसको सांची स्तूप की प्रेरणा पर बनाया गया हो। इस गुम्बद घेरे हुए एक द्वार मण्डप (पोर्च) बना हुआ है, जिसमें समान स्थित स्तंभ हैं, जो कि गुम्बद को उठाए हुए हैं और इन स्तंभों के बीछ खाली स्थान है। यह गुम्बद के हरेक ओर, सभी दिशाओं में हैं। इस के कारण ही, यह गुम्बद किसी भी कोण से देखने पर, यदि गर्मी के धुंधले मौसम में देखें, तो तैरता हुआ प्रतीत होता है। बाहरी गुम्बद की रेनफोर्स्ड कांक्रीट सीमेंट निर्मित गुम्बद, सन १९२९ के लगभग अपना आकार लेने लगा था। इस गुम्बद का अंतिम पाषाण ६ अप्रैल १९२९ को लगाया गया था। यद्यपि इसके ऊपर ताम्र आवरण सन १९३० तक नहीं लगा था।
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Saturday, 15 July 2017
दुनियां के इन क्रूर मानवों ने किया आदमी के ही मांस का भक्षण
दुनियां के इन क्रूर मानवों ने किया आदमी के ही मांस का भक्षण
अतीत में दुनिया भर के मनुष्यों के बीच व्यापक रूप से नरभक्षण का प्रचलन रहा था, जो 19वीं शताब्दी तक कुछ अलग-थलग दक्षिण प्रशांत महासागरीय देशों की संस्कृति में जारी रहा,और, कुछ मामलों में द्वीपीय मेलेनेशिया में, जहां मूलरूप से मांस-बाजारों का अस्तित्व था। फिजी को कभी 'नरभक्षी द्वीप' के नाम से जाना जाता था। माना जाता है कि निएंडरथल नरभक्षण किया करते थे,और हो सकता है कि आधुनिक मनुष्यों द्वारा उन्हें ही कैनिबलाइज्ड अर्थात् विलुप्त कर दिया गया हो।अकाल से पीड़ित लोगों के लिए कभी-कभी नरभक्षण अंतिम उपाय रहा है, जैसा कि अनुमान लगाया गया है कि ऐसा औपनिवेशिक रौनोक द्वीप में हुआ था। कभी-कभी यह आधुनिक समय में भी हुआ है। एक प्रसिद्ध उदाहरण है उरुग्वेयन एयर फ़ोर्स फ्लाइट 571 की दुर्घटना, जिसके बाद कुछ बचे हुए यात्रियों ने मृतकों को खाया. इसके अलावा, कुछ मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति दूसरों को खाने और नरभक्षण करने के मामले में ग्रस्त रहे हैं, जैसे कि जेफरी डाहमर और अल्बर्ट फिश. नरभक्षण पर मानसिक विकार का लेबल लगाने का औपचारिक रूप से विरोध किया गया है। धर्म, पौराणिक कथाओं, परी कथाओं और कलाकृतियों में नरभक्षण का विषय दर्शाया गया है, उदाहरणस्वरुप, 1819 में फ्रांसिसी शिला मुद्रक थियोडोर गेरीकौल्ट नेद राफ्ट ऑफ़ द मेडुसा में नरभक्षण को चित्रित किया है। लोकप्रिय संस्कृति में इस पर व्यंग्य किया गया है, जैसे कि मोंटी पायथन के लाइफबोट स्केच पाया गया।
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दुनियां का ऐसा पेड़ जिसके पास हमेशा रहती है मौत ।
दुनियां का ऐसा पेड़ जिसके पास हमेशा रहती है मौत ।
दोस्तों आप ने ये तो सुना ही होगा कि पेड़ पौधों से औषधियां बनतीं हैं ,इनकी जड़ ,तना और पत्तों का उपयोग औषधियां बनाने में किया जाता है ,मगर क्या आपने कभी ऐसे पेड़ का नाम सुना है कि जिसकी पत्ती मात्र छू जाने से मौत हो सकती है। आप का जबाब होगा शायद नहीं ,मगर मै आप को आज दुनियां के ऐसे पेड़ के बारे में बताने जा रहे है जिसको छूने मात्र से मौत हो जाती है।
उस पेड़ का नाम है मैंशीनील पेड़ इसके तने से निकलने वाला रस इतना जहरीला होता है कि अगर यह आपकी स्किन पर छू भी जाए तो छाले पड़ जाएंगे।यह पेड़ प्रमुखतः फ्लोरिड और कैरेबियन तट पर पाया जाता है।इस पेड़ का फल सेब जैसा दिखता है, लेकिन अगर इसका एक टुकड़ा भी आपने खा लिया तो मौत हो सकती है। यही नहीं इस पेड़ का रस किसी की आंखों तक पहुंच जाए तो वह अंधा हो सकता है और पेड़ की लकडियों को जलाने पर निकलने वाला धुआं भी अगर आंखों तक पहुंचे तो भी आंखों की रोशनी जा सकती है।बारिश में भी इस पेड़ के नीचे खड़े रहने से स्किन को नुकसान पहुंच सकता है।
इस कारण से पेड़ के आसपास चेतावनी वाले बोर्ड भी लगे हैं,जिनमे साफ शब्दों में लिखा है कि इस पेड़ की छाल ,पत्ती अथवा फल का उपयोग करने से आप की मौत हो सकती है । बता दें कि, इस मैंशीनील के पेड़ की ऊंचाई लगभग 50 फीट तक होती है।हालाँकि कुछ बैज्ञानिकों ने इसके फल को चखा मगर तुरंत इलाज हो जाने से उनकी जान बच गयी। हालाँकि कुछ बैज्ञानिकों ने इसके फल को चखा मगर तुरंत इलाज हो जाने से उनकी जान बाख गयी।यहाँ तक कहा जाता है कि इस पेड़ से हर हफ्ते एक व्यक्ति की मौत हो जाती है।दोस्तों मैंने ये जानकारी आप के लिए विश्व विरासत विश्वकोश नामक पुस्तक से ढूंढ निकाली है ।आशा करता हूँ कि ये लेख आपके लिए नया और ज्ञानवर्धक होगा ।
इस रहस्यमयी पेड़ को देख स्तब्ध हैं लोग, देखिए हैरतअंगेज तस्वीरे
इस रहस्यमयी पेड़ को देख स्तब्ध हैं लोग, देखिए हैरतअंगेज तस्वीरे
आंध्र प्रदेश के नालगोंडा में स्थित बरगद के इस पेड़ को जिसने भी देखा वह स्तब्ध रह गया।
इस पर विभिन्न जंगली जानवरों की आकृतियां बनी हुई हैं। सांप, विच्छु, मगरमच्छ और शेर जैसे खतरनाक जानवरों के दृश्य ऐसे दिखते हैं मानों साक्षात किसी को घूर रहे हों, सामने वाले को निगल जाने के फिराक में हो। इस रहस्यमयी पेड़ के बारे में तमाम बातें कही जा रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इस पेड़ के तनों पर किसी ने इन कलाकृतियों को गढ़ा है।
उनका मानना है कि यह कोई चमत्कार नहीं है। वहीं बहुतयात लोगों का मानना है कि यह अनोखी प्रजाति का पेड़ है। जो कि पूरी दुनिय़ा में इकलौता है। चमत्कार और वास्तविकता के बीच बहस जारी है।
Friday, 14 July 2017
कुछ सांप करते हैं वर्ष भर में एक या दो बार भोजन जाने साँपों की रहश्यमयी दुनियां
कुछ सांप करते हैं वर्ष भर में एक या दो बार भोजन जाने साँपों की रहश्यमयी दुनियां
दोस्तों आज मै आप के लिए साँपों का पिटारा खोलने वाला हूँ। साँप या सर्प, पृष्ठवंशी सरीसृप वर्ग का प्राणी है। यह जल तथा थल दोनों जगह पाया जाता है।
इसका शरीर लम्बी रस्सी के समान होता है जो पूरा का पूरा स्केल्स से ढँका रहता है। साँप के पैर नहीं होते हैं। यह निचले भाग में उपस्थित घड़ारियों की सहायता से चलता फिरता है। इसकी आँखों में पलकें नहीं होती, ये हमेशा खुली रहती हैं। साँप विषैले तथा विषहीन दोनों प्रकार के होते हैं।
इसके ऊपरी और निचले जबड़े की हड्डियाँ इस प्रकार की सन्धि बनाती है जिसके कारण इसका मुँह बड़े आकार में खुलता है। इसके मुँह में विष की थैली होती है जिससे जुडे़ दाँत तेज तथा खोखले होते हैं अतः इसके काटते ही विष शरीर में प्रवेश कर जाता है। दुनिया में साँपों की कोई २५००-३००० प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसकी कुछ प्रजातियों का आकार १० सेण्टीमीटर होता है जबकि अजगर नामक साँप २५ फिट तक लम्बा होता है।
साँप मेढक, छिपकली, पक्षी, चूहे तथा दूसरे साँपों को खाता है। यह कभी-कभी बड़े जन्तुओं को भी निगल जाता है।
सरीसृप वर्ग के अन्य सभी सदस्यों की तरह ही सर्प शीतरक्त का प्राणी है अर्थात् यह अपने शरीर का तापमान स्वंय नियंत्रित नहीं कर सकता है। इसके शरीर का तापमान वातावरण के ताप के अनुसार घटता या बढ़ता रहता है।यह अपने शरीर के तापमान को बढ़ाने के लिए भोजन पर निर्भर नहीं है इसलिए अत्यन्त कम भोजन मिलने पर भी यह जीवीत रहता है।
कुछ साँपों को महीनों बाद भोजन मिलता है तथा कुछ सर्प वर्ष में मात्र एक बार या दो बार ढेड़ सारा खाना खाकर जीवीत रहते हैं। खाते समय साँप भोजन को चबाकर नहीं खाता है बल्कि पूरा का पूरा निकल जाता है। अधिकांश सर्पों के जबड़े इनके सिर से भी बड़े शिकार को निगल सकने के लिए अनुकुलित होते हैं। अफ्रीका का अजगर तो छोटी गाय आदि को भी नगल जाता है। विश्व का सबसे छोटा साँप थ्रेड स्नेक होता है।
जो कैरेबियन सागर के सेट लुसिया माटिनिक तथा वारवडोस आदि द्वीपों में पाया जाता है वह केवल १०-१२ सेंटीमीटर लंबा होता है। विश्व का सबसे लंबा साँप रैटिकुलेटेड पेथोन (जालीदार अजगर) है, जो प्राय: १० मीटर से भी अधिक लंबा तथा १२० किलोग्राम वजन तक का पाया जाता है। यह दक्षिण -पूर्वी एशिया तथा फिलीपींस में मिलता है।ये लेख बिभिन्न किताबों से ली गयी जानकारी पर आधारित है ,इसका स्रोत देना संभव नहीं है .इसमे प्रयोग की गयी तस्वीरें गूगल से ली गयी हैं .


























































