खुश जिंदगी, खुशी जहान

जिंदगी का असली मतलब खुशियों में ही होता है। चाहे पैसे की कमी हो और जीवन पूरी तरह से खुश हो तो दुनिया की किसी और चीज की जरूरत नहीं पड़ती।

अच्छी हेल्थ है तो खुशियां तमाम है

अगर भोजन में अच्छे पोषक तत्वों वाली चीजों का उपयोग किया जाएगा तो शरीर स्वस्थ रहता है। स्वस्थ रहने से बड़ी दुनिया की कोई खुसी नहीं है।

नपुंसकता से डरें नहीं हमारे एक्सपर्ट की राय लें

स्तंभन दोष (ईडी) (नपुंसकता या इरेक्टाइल डिसफंक्शन एक ऐसी समस्या है जो शारीरिक रूप से अंतरंग संबंध बनाने के दौरान आपको आती है। जब ऐसा होता है तो रिश्ते में दरार आ सकती है। स्तंभन दोष पुरुषों के लिए एक बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति है।

सगे सम्बन्धियों से हो गया है प्यार, हमारे एक्सपर्ट करेंगे उद्धार

अगर आपको भी अपने किसी सगे सम्बन्धी से प्यार हो गया है या हालात ज्यादा नाजुक है तो हमारे ईमेल पर लिख भेजें अपनी समस्या। हमारे एक्सपर्ट देंगे सही राय। आपकी जानकारी भी रखी जाएगी गोपनीय।

असफलताओं से न हो निराश, हमारे एक्सपर्ट करेंगे नैया पार

अगर आप भी बार -बार असफल हो रहे हैं तो निराश न हो हमारे एक्सपर्ट आपकी फ्री में मदद करने के लिए तैयार हैं। आप अपनी समस्या ईमेल पर लिख भेजे और फिर इसके बाद असफल;असफलायें आप से दूर भागने लगेंगीं।

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Sunday, 8 October 2017

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की ये खबर सुनकर आप भी खुसी से झूम उठेंगे



सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की ये खबर सुनकर आप भी खुसी से झूम उठेंगे 

हेल्प इंडिया।दोस्तों बड़ी खुसी की बात है सदी के महानायक के सम्बन्ध में जिसे सुनकर आप भी उछल पड़ेंगे।

 आज हमारे महानायक के ट्विटर पर फलोवेर्स की संख्या ३० मिलियन हो गई हैं। लोगों का बधाईयाँ देने का ताँता सा लगा है। आखिर लगे भी क्यों न सब के प्रिय इतने हैं कि भारत के बहुत लोग उन पर अपनी जान छिदकतें हैं।

 दोस्तों मैं बात कर हूँ बालीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन जी के बारे में। आज ट्विटर पर लोग बधाइयाँ दे रहे है। उनके ट्विटर पर ३० मिलियन फालोवर हो गएँ हैं।

74 साल की उम्र के पड़ाव को पार करने के बाद भी उनका अभिनय देखकर ऐसा लगता ही नहीं की इनकी उम्र 74 वर्ष हो गई है ।

Sunday, 24 September 2017

इस रिक्शे वाले किया कुछ ऐसा जिसे सुनकर आप भी सीख जायेंगे इंसानियत

इस रिक्शे वाले किया कुछ ऐसा जिसे सुनकर आप भी सीख जायेंगे इंसानियत

हेल्प इंडिया। दोस्तों दुनियां में कुछ लोग बुरे होते हैं तो कुछ लोग भलाई और इंसानियत की मिसाल होते हैं। आदमी गरीब हो या अमीर ये मायेने नहीं रखता मायेने रखती है उसकी इंसानियत। दोस्तों  मैं आप को जो भी बताने जा रहा हूँ वह वास्तव में एक मिशाल है। बात है 23/09/२०१७ की लगभग सुबह का 10.30 बज रहा था। स्थान आई ओन डिजिटल जोन जानकीपुरम लखनऊ की। मेरी भी आईबीपीएस क्लर्क की प्रारंभिक परीक्षा इसी स्थान पर थी। परीक्षा हाल में प्रवेश से पहले पहचान स्वारूप एक आई डी देखी जा रही थी ,मेरे आगे लाइन में लगे एक लडके को परीक्षा देने से कोई आईडी न दिखाने के कारण प्रवेश देने से मना कर दिया। लड़का बहुत परेशान था ,यहाँ तक वो रो -रो कर बताने लगा कि मै अपना आधार कार्ड लाया था, और वो रास्तें में कहीं गायब हो गया ,मगर वहां उसकी कोई सुनने वाला नहीं था। मै भी क्या करता अतः मै परिक्षा कक्ष में चला गया। लड़का बहुत ही दुखी था ,और बार -बार प्रवेश देने की मिन्नतें कर रहा था। किन्तु उसकी कोई सुनने वाला नहीं था। परीक्षा शुरू होने में सिर्फ दस मिनट बचा था। तभी एक रिक्शे वाला तेजी से रिक्शा भगाता हुआ आई ओन डिजिटल जोन में में घुस पडा। वहां खड़े गार्ड उसे रोकने की काफी कोशिश करते रहे मगर रिक्शे वाला नहीं रुका और रुका वहाँ जहां सारा स्टाफ खडा था। सभी लोग अचंभित थे कि आखिर ये रिक्शे वाला किसी की बात नहीं मान रहा और चला आ रहा है। रिक्शे वाले ने हांफते हुए रिक्शा रोंका और पहले उतर सभी स्टाफ से माफी मांगी और बोला ,सर मै एक लडके को लेकर आया था और उसका गलती से आधार कार्ड मेरे रिक्शे में छूट गया था। मै वापस 4 किलोमीटर निकल चुका था मगर जब मेरी नजर इस आधार कार्ड पर पडी ,तो मैंने अपनी सभी सबारियों को वहीं छोड़ा और  भागता हुआ आ गया ,आखिर सबाल  किसी की जिन्दगी का था। वह आधार उसी लडके का था जो खड़ा रो रहा था ,आधार मिलते ही लडके के जान में जान आयी और रिक्शे वाले को धन्यवाद दिया और अन्दर प्रवेश कर गया। वहाँ खडा सारा स्टाफ समझ नहीं पा रहा था कि एक रिक्शे वाला भी इतना महान काम कर  सकता है। 

Wednesday, 13 September 2017

मानवता की मिशाल बने ये दो दोस्त, पढ़े आगरा की एक मार्मिक कहानी

मानवता की मिशाल बने ये दो दोस्त, पढ़े आगरा की एक मार्मिक कहानी

दोस्तों मानवता अभी भी ज़िंदा है।  आज मै आपको मानवता को प्रदर्शित करती एक पहल प्रकाश सिंह के ही जुबान से ही सुनाऊंगा। यह मार्मिक कहानी प्रकश सिंह से हुई वार्ता पर आधारित है । प्रकाश सिंह बताते है कि आज दिनांक 13.09.2017 को मैं अपने साथी बृजमोहन के साथ आ रहे थे कि पुलिस लाइन आगरा ग्राउड के सामने एक अँधा  आदमी सड़क के किनारे बैठा  था। भीड़  भाड़  लगी  हुयी थी। यही देकर हम दोनों साथी गए तो वह आदमी बेबस  था , बेबसी देखकर उसे हम साथ लेकर आये और पूछे  क्या तकलीफ है,भोजन करने की बात कही। पुलिस लाइन के सामने होटल  पर भोजन  करवाया। उससे पूछने पर बताया  की मेरा नाम शकील  है ,मै बुलंद शहर  का रहने  वाला हु।  सम्बंधित थाना  प्रभारी  से वार्ता किये,उसके बाद शकील  जो की अँधा है,बोला साहब आप लोग हमें यही रहने दीजिये। मैं चला जाऊंगा,यह बात सुनकर हमें बहुत तकलीफ हुयी। हम उसके गाँव जाने के लिए पैसा / किराया  देने के लिए तैयार थे,लेकिन उस आदमी से बार  बार पूछा  गया,वह यही कह रहा था कि मै चला जाऊंगा । उसके बाद मै और मेरा साथी हम दोनों वापस  चले आये। 

Sunday, 10 September 2017

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वाश रगों मे साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
डुबकियां सिन्धु मे गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोंती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है , इसे स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो .
जब तक ना सफल हो , नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम.
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
यह कविता श्री सोहन लाल द्ववेदी द्वारा रचित है 

Saturday, 26 August 2017

तीन तलाक के बाद राष्ट्रहित और जनहित में सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला भी जरूर सुनाना चाहिए


तीन तलाक के बाद राष्ट्रहित और जनहित में सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला भी जरूर सुनाना चाहिए


देश के अंदर जादू टोने, तन्त्र मंत्र, झाड़फूंक द्वारा मनुष्य की सभी समस्याओं जैसे गृह क्लेश, हवा धूल, प्रोमोशन, कारोबार में तरक्की, सौतन से छूटकारा, दुश्मन से छुटकारा, किसी को भी वश में करना, नौकरी की गारंटी, हर समस्या के 24 घण्टे में समाधान,और ला इलाज बीमारियों का इलाज करने वाले सभी बाबा, तांत्रिक, आचार्य, पण्डित, मौलवी, भगतो और पाखंडियो का सर्च ऑपेरशन करा कर सभी की दुकान स्थायी रूप से बंद करने, और  इन्हें जेल में डालने का आदेश कर दिया जाए,

 क्योकि अगर देश मे हर साल 500000 मौत होती होंगी तो 50 प्रतिशत तो इनके जादू टोने ओर टोटके के  चक्कर मे हो रही है, क्योकि कुछ इनसे बीमारी का इलाज करवाने में मर जाते है कुछ खुद के फायदे के लिये दूसरों की बलि दे देते है। ये लोग मानव विकास ही नही बल्कि मानवजाति के लिये विध्वंशकारी है।  

आरक्षण एक मजाक नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज का आईना है पढ़िए कड़वी सच्चाई


आरक्षण एक मजाक नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज का आईना है पढ़िए कड़वी सच्चाई 


मंदिर में पुजारी की नियुक्ति आर्थिक आधार पर होती है या जाति के आधार पर। समाज में लड़का लड़की का संबंध आर्थिक आधार पर होता है या जाति के आधार पर।  इस देश में सामाजिक भेदभाव (छुआ-छूत) आर्थिक आधार पर होता है या जाति के आधार पर। ब्राह्मण, छत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों का निर्धारण आर्थिक आधार पर हुआ था या जाति के आधार पर। देश में मनु द्वारा वर्ण व्यवस्था आर्थिक आधार पर बनी थी या जाति के आधार पर। इसके अलावा बहुत कुछ निर्धारण करते हो जाति के आधार पर,और आरक्षण चाहिए आर्थिक आधार पर,वाह रे , वाह ,अरे जाति से इतनी ही नफरत है तो क्यों नहीं देश में जाति के लिखने, बोलने, पूछने और बताने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हो। जाति को लिखने बताने पूछने पर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करो, जाति अपने आप समाप्त हो जाएगी और जाति आधारित आरक्षण भी समाप्त हो जाएगा । इसलिए इस देश के सभी धूर्त स्वार्थियो, खुदगर्जो देश से जाति मिटाने की मांग करो वरना जब तक जातिवाद रहेगा,आरक्षण आबाद रहेगा। 

Sunday, 20 August 2017

डॉ अब्दुल कलाम के जीवन की कुछ ऐसी सच्चाइयाँ जिन्हें सुनकर आप अपने आंसू नहीं रोंक नहीं पाएँगे


डॉ अब्दुल कलाम के जीवन की कुछ ऐसी सच्चाइयाँ जिन्हें सुनकर आप अपने आंसू नहीं रोंक नहीं पाएँगे 


दूरदर्शन के एक दक्षिण भारतीय भाषा के चैनल से श्री पी एम नायर जोकि एक सेवा निवर्त प्रसाशनिक अधिकारी है और वो पूर्व राष्ट्रपति स्व श्री ए पी जे कालाम साहब के निजी सचिव उस वक्त थे जब कालाम साहब देश के राष्ट्रपति थे। उनके उस इंटरव्यू के दौरान  श्री नायर साहब ने जो कुछ भी कहा वो पूरी तरह से तो यहा नही पेश के पाऊंगा पर कुछ महत्व पूर्ण बिंदुओं को आपके सामने लाना चाहता हूं। श्री नायर ने एक किताब भी लिखी है जिसका शीर्षक है कलाम इफ़ेक्ट           डॉ कालाम अपनी हर विदेश यात्रा में बहुमूल्य उपहार प्राप्त करते थे जो कि प्रथा अनुसार मेजबान देश के प्रमुख  मेहमान देश प्रमुख को उनके सम्मान स्वरूप देते है। उन उपहारों को प्राप्त करने से मना करना मेजबान देश का अपमान होगा अतः कालाम साहब उन उपहारों को धन्यवाद के साथ स्वीकार करते थे।परंतु देश वापिस आते ही वो उन उपहारों के फोटो खिंचवाकर उनकी सूची तैयार करवाकर उन को राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय को सौप देते थे। फिर कभी भी उन उपहारों के बारे में पूछते भी नही थे।कलाम साहब जब सेवा निवर्त हुए तो उन उपहारों से एक पेंसिल भी अपने साथ नही ले गए। सारे के सारे उपहार राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में रहे।
 २००२, ये वो साल है जब श्री कलाम भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे, रमजान जुलाई अगस्त के महीने में आया था।इस अवसर पर इफ्तार की भोज को आयोजन करना राष्ट्रपति भवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी। डॉ कलाम ने श्री नायर को बुलाकर इस आयोजन पर आने वाले खर्च को पूछा और साथ मे पूछा कि वो क्यो इस इफ्तार भोज का आयोजन ऐसे व्यक्तियों के लिए करे जो स्वयम ही पहले से समर्थ है और प्रतिदिन अच्छा भोजन  प्राप्त करते है।श्री नायर ने उन्हें बताया कि तकरीबन बाइस लाख रुपया उस इफ्तार भोज के आयोजन पर राष्ट्रपति भवन का खर्च होता था।
डॉ कलाम ने उन्हें आदेश दिया कि वो सारी रकम  को कुछ अनाथालयों में वस्त्र, भोजन और कम्बलों के रूप में दान की जाए।उन्होंने अनाथालयों  का चुनाव करने के लिए एक टीम को जिम्मेदारी दी उस चुनाव के कार्य मे उन्होंने किसी भी प्रकार का दखल नही दिया।जब टीम ने अनाथालयों की सूची तैयार कर ली तो कालाम साहब ने श्री नायर को अपने कमरे में बुला कर एक लाख रुपये का चेक, जो कि उनके निजी खाते से काटा हुआ था, दिया और कहा कि वो अपनी निजी बचत से ये थोड़ा सा धन दे रहे है जो अनाथलयो में दान किया जाए। उन्होंने साथ मे ये हिदायत दी कि उस चेक के बारे किसी को भी न बताया जाए।
श्री नायर ने उस इंटरव्यू में बताया कि वो कालाम साहब की उस हिदायत को सुनकर अचंभे में आ गये। उन्होंने कालाम साहब को कहा कि वो क्यो न सबको उस बात को बताये की इस देश के राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति है जो न केवल अपने अधिकार से जो खर्च कर सकते वो सारा धन, दान में देते है बल्कि खुद के निजी खाते से भी दान देते है,डॉ कालाम यद्यपि एक धार्मिक मुस्लिम थे, पर उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन में इफ्तार का भोज का आयोजन नही हुआ।
डॉ कलाम को हा में हा मिलाने वाले लोग पसंद नही थे।एक बार देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति महोदय से मुलाकात को पधारे थे और किसी विषय पर विचार विमर्श के दौरान डॉ कालाम ने एक बिंदु पर किसी बात पर अपने विचार प्रकट किए फिर उन्होंने नायर साहब से पूछा कि क्या आप मेरी बात से सहमत है,नही श्रीमान मैं आपकी बात से सहमत नही हूँ।नायर साहब ने उनको जवाब दिया।मुख्य न्यायाधीश महोदय को अपने कानों पर विश्वास नही हुआ कि एक सचिव की इतनी हिम्मत की वो राष्ट्रपति जी की बात से सहमत न हो और वो भी अन्य उपस्थित व्यक्तियों के समक्ष।तब श्री नायर ने उन्हें बताया कि राष्ट्रपति जी उनसे पूछेगें की वो क्यो असहमत है और वो यदि मेरे कारण बताने के बाद यदि उन्हें मेरे बताये कारण सही लगे तो 99% ये बात सही है कि वो अपना निर्णय बदल देंगे।
एक बार उन्होंने अपने पचास रिस्तेदारो को दिल्ली बुलाया और उन्हें राष्ट्रपति भवन में ठहराया।
उन्होंने उनके दिल्ली दर्शन के लिए एक बस का प्रबंध करवाया और उस बस का किराया स्वयम के निजी खाते से वहन किया।कोई भी सरकारी वाहन उन रिस्तेदारो के लाने लेजाने के लिए प्रयोग नही किया।उन रिस्तेदारो के ठहरने के दौरान उन रिस्तेदारो के ऊपर जो भी खर्च उनको भोजन और ठहरने की व्यवस्था पर हुआ उसका पूरा हिसाब मांगा जो लगभग दौ लाख के आसपास हुआ। कालाम साहब ने वो सारा खर्च अपने निजी धन से वहन किया।इस देश के इतिहास में उनसे पहले किसी ने भी ऐसा नही किया था।अब आप एक और घटना को सुने।डॉ कालाम के बड़े भाई उनके साथ उन्ही कमरे में पूरे एक सप्ताह रहे। ऐसा डॉ कालाम की इच्छा के अनुसार हुआ।जब वो वापिस गए तो डॉ कालाम ने उनके रहने के दिनों का किराया भी देना चाहा।जरा कल्पना कीजिये कि कोई राष्ट्रपति अपने रहने के कमरे का भी किराया देना चाहता था।ये वैसे राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों ने नही माना और सबने सोचा कि ये तो ईमानदारी की परकाष्ठा थी।
Sarkari Naukri Sarkari Result Naukri जब राष्ट्रपति कालाम साहब का कार्यकाल पूरा हुआ तब राष्ट्रपति भवन के सभी कर्मचारी अपने परिवार सहित उनके सम्मानार्थ उनसे भेंट करने गए।श्री नायर उनसे मिलने अकेले गए तो कालाम साहब ने उनके परिवार के बारे में पूछा तब उन्हें पता चला की नायर साहब की पत्नी एक दुर्घटना के कारण पांव की हड्डी टूटने की वजह से चल नही पा रही थी और घर पर थी।अगले दिन सुबह श्री नायर ने देखा कि बहुत से पुलिस वाले उनके घर के बाहर खड़े थे तो उन्होंने उसका कारण पूछा तो पता चला कि राष्ट्रपति महोदय स्वयम ही उनके घर आ रहे थे। कालाम साहब श्री नायर के घर जाकर उनकी पत्नी से मिले उनका हाल चाल पूछा और कुछ समय भी बिताया।
श्री नायर ने बताया कि कोई भी राष्ट्रपति अपने सचिव के घर कभी भी नही जाएगा और वो भी इतने साधारण वजह के लिए। मेरे मित्र ने सोचा कि वो हमें ज्यादा से ज्यादा उस प्रसारित इंटरव्यू की बाते हमको बताये क्योकि वो दक्षिण भाषा के दूरदर्शन चेनल से प्रसारित हुआ था जिसे शायद ही किसी ने इस देश के भाग में देखा हो। इसलिए ये उस इंटरव्यू की बाते मुझे इंग्लिश भाषा मे भेजी उसे मैने सब की जानकारी के लिए हिंदी भाषा मे रूपान्तरित किया है।हाँ एक बात और जो उस इंटरव्यू के दौरान पता चली की कालाम साहब के छोटे भाई एक छतरी की मरम्मत करने की दुकान चलाते है।  श्री नायर उनसे जब श्री कालाम साहब के अंतिम संस्कार के दौरान मिले तो उन्होंने श्री नायर के पांव छू लिए जोकि उनकी अपने बड़े भाई कालाम साहब और श्री नायर के प्रति श्रद्धा का प्रतीक था।
ये कुछ ऐसी बाते है जिनका प्रसार जन जन के बीच हो ताकि इनसे प्रेरणा लेकर शायद कुछ और कालाम इस पवित्र धरती पर पैदा हो।
व्यवसायी प्रसार के साधन शायद ही इन बातों को प्रसारित करे क्योकि इन बातों की टेलिविज़न रेटिंग पॉइंट यानी टीआरपी कीमत नही है। 

मैं और मेरे घर आये विज्ञान को न मानने वाले व्यक्ति की बेहद दिलचस्प कहानी


मैं और मेरे घर आये विज्ञान को न मानने वाले व्यक्ति की बेहद दिलचस्प कहानी

हेल्प इंडिया। कुछ दिन पहले एक धार्मिक व्यक्ति,हमारे पास रात गुज़ारने आया, वह थोड़ा बीमार था। लेकिन धार्मिक स्कूल में पढ़ा था तो दिमाग़ी तौर पे बहुत बीमार था। मैं रात को दूसरे लड़कों को जीव विज्ञान के बारे में कुछ बता रहा था, धार्मिक व्यक्ति बोला,ये सब झूठ है,साइंस की बातों के पीछे लगकर ज़िंदगी बर्बाद मत करो, साइंस-वाइंस कुछ नहीं होती है। मैंने उसकी दवा उठाकर अपनी जेब में डाली,उसका मोबाइल ऑफ़ करके अपनी जेब में डाला,और रूम की लाइट और पंखा बंद कर दिया।धार्मिक व्यक्ति बोला,ये क्या कर रहे हैं।मैंने कहा,ये दवाई, मोबाइल,पंखा,बल्ब ये सब साइंस के आविष्कार हैं।अब अंधेरे में बैठकर मच्छर मार और बोल कि साइंस कुछ नहीं होती।धार्मिक प्राणी खिसयानी हंसी हंसने लगा।मैंने लाइट ऑन की और उससे कहा,साइंस से जुड़ी हर चीज़ का सिर्फ़ दस दिन त्याग करके दिखा दे,उसके बाद बोलना कि साइंस कुछ नहीं होती,वह व्य्यक्ति बिना कुछ बोले चुपचाप सो गया।
ऐसे धार्मिक व्यक्क्तिओं की कमी नहीं है,जो साइंस की हर चीज़ इस्तेमाल करते हैं और साइंस के विरुद्ध भी बोलते हैं।साइंस के जिन अविष्कारों ने हमारे जीवन और दुनिया को बेहतर बनाया है, वे सब अविष्कार उन्होंने किये, जिन्होंने धार्मिक कर्मकांडों में समय बर्बाद नहीं किया। आज कोई भी धार्मिक व्यक्ति साइंस से संबंधित चीज़ों के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता,लेकिन ये एहसान फ़रामोश साइंसदानों का एहसान नहीं मानते। ये उस काल्पनिक शक्ति का एहसान मानते हैं, जिसने मानव के विकास में बाधा डाली है और जिसने मानवता को टुकड़ों में बांटा है।

मुजफ्फर नगर में हुई ट्रेन दुर्घटना में घायलों और यात्रिओं के लिए यह इंसान बन गया देवता


मुजफ्फर नगर में हुई ट्रेन दुर्घटना में घायलों और यात्रिओं के लिए यह इंसान बन गया देवता 

हेल्प इंडिया। दोस्तों इंसान कभी -कभी शैतान का रूप धारण कर लेता है ,और कभी वही इंसान लोगों के लिए भगवान बन जाता। मुजफ्फर नगर में हुई ट्रेन दुर्घटना वास्तव में बहुत ही भयानक थी ,चारों ओर चीखें ही चीखें सुनाई देती थी।इस दुर्घटना में कई लोगों को अपनी जिन्दगी से हाथ भी धोने पड़े ,और बहुत लोग बहुत ही गंभीर रूप से घायल हुए। दोस्तों एक कहावत है डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। मै आप को ऐसे ही एक व्यक्ति के बारे में बताने जा रहा हूँ ,जो इस दुर्घटना में घायल हुए उनके लिए देवता बनकर सामने आया। इस व्यक्ति ने एक अनूठी पहल की  मुजफ्फरनगर खतौली के रहने वाले योगेंद्र त्यागी जिनका दावत रेस्टोरेंट चलता है। उन्होंने ट्रेन दुर्घटना में घायल हुए यात्रियों एवं प्रशासन की मदद हेतु उस संकट की घड़ी में योगेश त्यागी व रेस्टोरेंट का सभी स्टाफ ने ट्रेन दुर्घटना में घायल हुए तथा सभी ट्रेन यात्रियों की सरकार द्वारा व्यवस्था होने तक घटनास्थल से 4 किलोमीटर दूर मंसूरपुर में रुकने सहित मुफ्त में भोजन व्यवस्था का प्रबन्ध किया है। जो भी यात्री इधर उधर भटक रहा है। वह योगेश त्यागी जी के यहाँ रह सकता है। योगेंद्र त्यागी जी ने अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक किया है ,जो भी भी फंसा हो उनके मोबाइल नंबर पर फोन कर उनके पास मुफ्त में रह सकता है। योगेंद्र त्यागी जी का मोबाइल नंबर है 9837849051,हेल्प इंडिया योगेंद्र त्यागी जी को सैलूट करता है। 

Saturday, 19 August 2017

राजा और फकीर,एक बहुत ही प्रेणनादाई कहानी


राजा और फकीर,एक बहुत ही प्रेणनादाई कहानी

एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा ,बादशाह को उस फकीर से बहुत प्रेम  हो गया। प्रेमभी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ हीकरते।एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।
फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला,बहुत स्वादिष्ट, ऎसा फल मैनें कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा,यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं
करते,और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह बहुत कड़वा था।राजा बोला,तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए।उस फकीर का उत्तर था,जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं।सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। दोस्तों जँहा मित्रता हो वहाँ संदेह न हो, आओ कुछ ऐसे रिश्ते रचे,कुछ हमसे सीखें , कुछ हमे सिखाएं,किस्मत की एक आदत है कि वो पलटती जरुर है ,और जब पलटती है,तब सब कुछ पलटकर रख देती है। इसलिये अच्छे दिनों मे अहंकार न करो और खराब समय में थोड़ा सब्र करो।

Monday, 14 August 2017

रामनाथ कोविंद और मोदी में इतनी गहरी थी मित्रता जानकर हो जायेंगे हैरान

  • रामनाथ कोविंद और मोदी में बचपन से इतनी गहरी थी मित्रता जानकर हो जायेंगे हैरान

  • हेल्प इंडिया समाचार। महामहिम श्री रामनाथ कोविंद जी को जानने वाले बताते हैं कि मोदी जी जब कानपुर में कोविंद जी के घर पर ठहरे थे, तो उन्हें संघ की बैठक में शामिल होने के लिए जयनारायण स्कूल जाना था। रामनाथ कोविंद से इस स्कूल की दूरी करीब एक किलोमीटर थी। कोविंद जी ने अपनी साइकिल निकाली और साइकिल पर ही मोदी जी को लेकर बैठक में पहुंच गए। कहते हैं कि फिर तो ये सिलसिला करीब-करीब रोज़ का हो गया। मोदी जी जितने दिन वहां रुके उन्हें संघ की बैठक में पहुंचाने के लिए रामनाथ कोविंद जी सुबह-सुबह अपनी साइकिल निकालते और नरेंद्र मोदी जी को लेकर जयनारायण स्कूल पहुंचा देते।
  • रामनाथ कोविंद जी को करीब से जानने वाले ये भी बताते हैं कि पीएम मोदी और खुद के लिए कोविंद अपने घर से बनाया हुआ खाना लेकर जाते थे। दोनों साथ बैठकर खाना खाया करते थे। मोदी को कोविंद के घर की तुअर की दाल और चूल्हे की रोटी बेहद पसंद थी।इस दौरान मोदी करीब 15 दिनों तक कानपुर में रुके। एक दिन मोदी ने रामनाथ कोविंद से बिठूर जाने की इच्छा जताई। बिठूर कानपुर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है और गंगा के किनारे बसा है। मोदी का मन देखकर रामनाथ कोविंद तुरंत तैयार हो गए।कहते हैं कि मोदी और कोविंद दोनों साइकिल पर ही सवार होकर बिठूर के लिए निकले लेकिन रास्ते में साइकिल पंक्चर हो गई।कोविंद ने अपने किसी परिचित के घर पर साइकिल खड़ी की। फिर बाकी का रास्ता दोनों ने पैदल ही तय किया ।तो इस देश का शीर्ष नेतृत्व इतना सादगी भरा हुआ है।ये लेख लेखक द्वारा रामनाथ कोविंद और नरेन्द्र मोदी के जीवन परिचय के अंशों पर आधारित है।

Saturday, 29 July 2017

थोड़ी सी हिम्मत ने जान बचा ली प्रेरणादायक कहानी एक बार जरूर पढ़ें


थोड़ी सी हिम्मत ने जान बचा ली प्रेरणादायक कहानी एक बार जरूर पढ़ें


बहुत समय पहले की बात है, एक चरवाहा था। जिसके पास 10 भेड़े थीं। वह रोज उन्हें चराने ले जाता और शाम को बाड़े में डाल देता। सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक सुबह जब चरवाहा भेडें निकाल रहा था तब उसने देखा कि बाड़े से एक भेड़ गायब है। चरवाहा इधर-उधर देखने लगा, बाड़ा कहीं से टूटा नहीं था और कंटीले तारों की वजह से इस बात की भी कोई सम्भावना न थी कि बाहर  से कोई जंगली जानवर अन्दर आया हो और भेड़ उठाकर ले गया हो।चरवाहा बाकी बची भेड़ों की तरफ घूमा और पुछा ,क्या तुम लोगों को पता है कि यहाँ से एक भेंड़ गायब कैसे हो गयी,क्या रात को यहाँ कुछ हुआ था।सभी भेड़ों ने ना में सर हिला दिया। उस दिन भेड़ों के चराने के बाद चरवाहे ने हमेशा की तरह भेड़ों को बाड़े में डाल दिया। अगली सुबह जब वो आया तो उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयीं, आज भी एक भेंड़ गायब थी और अब सिर्फ आठ भेडें ही बची थीं।इस बार भी चरवाहे को कुछ समझ नहीं आया कि भेड़ कहाँ गायब हो गयी। बाकी बची भेड़ों से पूछने पर भी कुछ पता नहीं चला। ऐसा लगातार होने लगा और रोज रात में एक भेंड़ गायब हो जाती। फिर एक दिन ऐसा आया कि बाड़े में बस दो ही भेंड़े बची थीं। चरवाहा भी बिलकुल निराश हो चुका था, मन ही मन वो इसे अपना दुर्भाग्य मान सब कुछ भगवान् पर छोड़ दिया था।आज भी वो उन दो भेड़ों के बाड़े में डालने के बाद मुड़ा। तभी पीछे से आवाज़ आई ,रुको-रुको मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ वर्ना ये भेड़िया आज रात मुझे भी मार डालेगा । चरवाहा फ़ौरन पलटा और अपनी लाठी संभालते हुए बोला, “भेड़िया ! कहाँ है भेड़िया। भेड़ इशारा करते हुए बोली ,ये जो आपके सामने खड़ा है दरअसल भेड़ नहीं, भेड़ की खाल में भेड़िया है। जब पहली बार एक भेड़ गायब हुई थी तो मैं डर के मारे उस रात सोई नहीं थी। तब मैंने देखा कि आधी रात के बाद इसने अपनी खाल उतारी और बगल वाली भेड़ को मारकर खा गया। भेड़िये ने अपना राज खुलता देख वहां से भागना चाहा, लेकिन चरवाहा चौकन्ना था और लाठी से ताबड़तोड़ वार कर उसे वहीँ ढेर कर दिया।चरवाहा पूरी कहानी समझ चुका था और वह क्रोध से लाल हो उठा, उसने भेड़ से चीखते हुए पूछा ,जब तुम ये बात इतना पहले से जानती थीं तो मुझे बताया क्यों नहीं। भेड़ शर्मिंदा होते हुए बोली , मैं उसके भयानक रूप को देख अन्दर से डरी हुई थी, मेरी सच बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई, मैंने सोचा कि शायद एक-दो भेड़ खाने के बाद ये अपने आप ही यहाँ से चला जाएगा पर बात बढ़ते-बढ़ते मेरी जान पर आ गयी और अब अपनी जान बचाने का मेरे पास एक ही चारा था,हिम्मत करके सच बोलना, इसलिए आज मैंने आपसे सब कुछ बता दिया। चरवाहा बोला ,तुमने ये कैसे सोच लिया कि एक-दो भेड़ों को मारने के बाद वो भेड़िया यहाँ से चला जायेगा,भेड़िया तो भेड़िया होता है वो अपनी प्रकृति नहीं बदल सकता । जरा सोचो तुम्हारी चुप्पी ने कितने निर्दोष भेड़ो की जान ले ली। अगर तुमने पहले ही सच बोलने की हिम्मत दिखाई होती तो आज सब कुछ कितना अच्छा होता।
दोस्तों, ज़िन्दगी में ऐसे कई मौके आते हैं जहाँ हमारी थोड़ी सी हिम्मत एक बड़ा फर्क डाल सकती है पर उस भेड़ की तरह हममें से ज्यादातर लोग तब तक चुप्पी मारकर बैठे रहते हैं जब तक मुसीबत अपने सर पे नहीं आ जाती। चलिए इस कहानी से प्रेरणा लेते हुए हम सही समय पर सच बोलने की हिम्मत दिखाएं और अपने देश को भ्रष्टाचार, इस बार भी चरवाहे को कुछ समझ नहीं आया कि भेड़ कहाँ गायब हो गयी।

Wednesday, 26 July 2017

दो पत्थरों की जिन्दगी और संघर्ष की प्रेणनादायक कहानी



दो पत्थरों की जिन्दगी और संघर्ष की प्रेणना दायक कहानी 


नदी पहाड़ों की कठिन व लम्बी यात्रा के बाद तराई में पहुंची। उसके दोनों ही किनारों पर गोलाकार, अण्डाकार व बिना किसी निश्चित आकार के असंख्य पत्थरों का ढेर सा लगा हुआ था। इनमें से दो पत्थरों के बीच आपस में परिचय बढ़ने लगा। दोनों एक दूसरे से अपने मन की बातें कहने-सुनने लगे।इनमें से एक पत्थर एकदम गोल-मटोल, चिकना व अत्यंत आकर्षक था जबकि दूसरा पत्थर बिना किसी निश्चित आकार के, खुरदरा व अनाकर्षक था।एक दिन इनमें से बेडौल, खुरदरे पत्थर ने चिकने पत्थर से पूछा, हम दोनों ही दूर ऊंचे पर्वतों से बहकर आए हैं फिर तुम  इतने गोल-मटोल, चिकने व आकर्षक क्यों हो जबकि मैं नहीं । यह सुनकर चिकना पत्थर बोला, “पता है शुरुआत में मैं भी बिलकुल तुम्हारी तरह ही था लेकिन उसके बाद मैं निरंतर कई सालों तक बहता और लगातार टूटता व घिसता रहा हूं,ना जाने मैंने कितने तूफानों का सामना किया है,कितनी ही बार नदी के तेज थपेड़ों ने मुझे चट्टानों पर पटका है ,तो कभी अपनी धार से मेरे शरीर को  काटा है, तब कहीं जाकर मैंने ये रूप पाया है।

जानते हो, मेरे पास हेमशा ये विकल्प था कि मैं इन कठनाइयों से बच जाऊं और आराम से एक किनारे पड़ा रहूँ,पर क्या ऐसे जीना भी कोई जीना है। नहीं, मेरी नज़रों में तो ये मौत से भी बदतर है।
तुम भी अपने इस रूप से निराश मत हो,तुम्हें अभी और संघर्ष करना है और निरंतर संघर्ष करते रहे तो एक दिन तुम मुझसे भी अधिक सुंदर, गोल-मटोल, चिकने व आकर्षक बन जाओगे।मत स्वीकारो उस रूप को जो तुम्हारे अनुरूप ना हो,तुम आज वही हो जो मैं कल था, कल तुम वही होगे जो मैं आज हूँ,या शायद उससे भी बेहतर, चिकने पत्थर ने अपनी बात पूरी की।
दोस्तों, संघर्ष में इतनी ताकत होती है कि वो इंसान के जीवन को बदल कर रख देता है। आज आप चाहे कितनी ही विषम पारिस्थति में क्यों न हों,संघर्ष करना मत छोड़िये,अपने प्रयास बंद मत करिए. आपको बहुत बार लगेगा कि आपके प्रयत्नों का कोई फल नहीं मिल रहा लेकिन फिर भी प्रयत्न करना मत छोडिये। और जब आप ऐसा करेंगे तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो आपको सफल होने से रोक पाएगी।

Monday, 24 July 2017

चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं एक प्रेणनादायक कहानी


चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं एक प्रेणनादायक कहानी 


एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे।उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा – मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है। आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा। वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई। संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए।शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।” अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था।यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- ‘गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया। उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।
संत फिर बोले-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। उन्होंने आगे कहा- ‘उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था। चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे।इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया। चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा।अब तुम्हीं बताओ, मैंने सही किया या गलत।यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।
प्रिय दोस्तों,
ठीक इसी तरह दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसे दिखती हैं जैसे हम हैं। अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।
सोर्स -यहाँ क्लिक करें 

Saturday, 22 July 2017

पत्थर से इतना लगाव तो जीवित से इतनी नफरत क्यों आश्चर्यचकित करने वाली बाते जरूर पढ़ें


पत्थर से इतना लगाव तो जीवित से इतनी नफरत क्यों आश्चर्यचकित करने वाली बाते जरूर पढ़ें 

 चूहा अगर पत्थर का तो उसको पूजता है। गणेश की सवारी मानकर, लेकिन जीवित चूहा दिख जाये तो पिंजरा लगाता है और चूहा मार दवा खरीदता है।

सांप अगर पत्थर का तो उसको पूजता है। शंकर का कंठहार मानकर, लेकिन जीवित सांप दिख जाये तो लाठी लेकर मारता है और जबतक मार न दे, चैन नही लेता।

बैल अगर पत्थर का तो उसको पूजता है,शंकर की सवारी मानकर ,लेकिन जीवित बैल(सांड) दिख जाये तो उससे बचकर चलता है ।

कुत्ता अगर पत्थर का तो उसको पूजता है। भैरो  नाथ की सवारी मानकर,लेकिन जीवित कुत्ता दिख जाये तो 'भाग कुत्ते' कहकर अपमान करता है। हे मानव पत्थर से इतना लगाव क्यों और जीवित से इतनी नफरत क्यों। यह लेख लेखक के अपने स्वंम विचारों पर आधारित है। इस लेख में किसी को आहात करने या किसी भावनाओ को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं की गयी है ,लेख में सिर्फ जीवित जानवरों से भी प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। लेख में समस्त फोटो गूगल से लिए गए हैं जिनका लेख की वास्विकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

सोंच जितनी बड़ी होगी सफलता उतनी ही बड़ी मिलेगे एक जिन्दगी बदल देने वाली कहानी


सोंच जितनी बड़ी होगी सफलता उतनी ही बड़ी मिलेगे एक जिन्दगी बदल देने वाली कहानी 

नीरपुर नाम के एक गांव में पानी की बहुत कमी हो गई थी। वहां के सभी कुएं सूख चुके थे जिसकी वजह से पीने के लिए भी पानी की बहुत कमी थी।गांव में पानी न होने के कारण वहां के लोग दूर के गांव से पीने के लिए पानी लाते थे लेकिन दूरी इतनी ज्यादा थी कि सुबह जाकर शाम को ही पानी लाया जा सकता था।गांव के मुखिया ने गांव के सभी लोगों को अपने पास बुलाया और सभी से इस समस्या के निवारण के बारे में पूछा। गांव का कोई भी व्यक्ति समस्या का किसी भी प्रकार से कोई समाधान न दे सका।मुखिया ने निर्णय लिया कि सभी लोग इस गांव को छोड़कर किसी अन्य जगह पर चलते हैं जहाँ पानी मिल सके। लेकिन अब समस्या यह थी कि अपना घर, सामान और जमीन को छोड़कर कैसे किसी दूसरी जगह जाया जा सकता है।किसी को भी इस समस्या का हल नहीं सूझ रहा था। सभी सोच रहे थे पता नहीं अब हम सब लोगों का क्या होगा?

तभी दूर से एक साधु आता हुआ उन्हें नजर आया। जैसे ही साधु उनके पास आया, सभी लोग उसके पास गए और कहा, अब आप ही हमारी रक्षा करो और हमें इतनी बड़ी परेशानी से बचाओ।साधु ने कहा, ठीक है, जब तक गांव में सूखा पड़ा हुआ है, तब तक मैं आपकी सहायता करूँगा। मैं अपनी शक्ति के द्वारा सभी को पानी दूंगा लेकिन मेरी कुछ शर्त हैं। यदि आप शर्तों को मानेगें तभी मैं आपको पानी दे पाउँगा।गांव के लोग साधु की प्रत्येक शर्त मानने को तैयार हो गए।तब साधु बोला,मैं प्रत्येक गांववासी के लिए केवल एक बर्तन में पानी दूंगा।

 पानी के लिए सभी लोग अपना अपना बर्तन रात में अँधेरा होते ही अपने घर के बाहर रख देना। मैं सभी में पानी भर दूंगा। बाद में सभी लोग सुबह होने से पहले अँधेरे में ही अपने बर्तन उठाकर घर में रख लेना और उसका पानी प्रयोग करना। और यह भी ध्यान रहे कि कोई भी एक दूसरे का न तो बर्तन देखेगा और न ही एक दूसरे का पानी प्रयोग करेगा।गांव के सभी लोग तुरंत तैयार हो गए। अब लोग रात होते ही अपना अपना बर्तन घर के बाहर रखते और सुबह होने से पहले पानी से भरा बर्तन अपने घर में रख लेते।एक सप्ताह बाद गांव का मुखिया गांव के लोगों से मिला और पानी सही से मिल रहा है या नहीं, इसके बारे में पूछा।तब कुछ लोगों ने बताया कि उन्हें पीने तक का भरपूर पानी नहीं मिल रहा है। कुछ लोग बोले कि हम तो खूब पानी पी रहे हैं और घर के सभी जरुरी कामों में भी प्रयोग कर रहे हैं लेकिन इतना नहीं मिलता कि हम नहा सकें या कपड़े धो सकें।कुछ देर बाद मुखिया को ऐसे लोग मिले जो बोले कि हमें इतना पानी मिल जाता है कि हम उससे नहा भी सकते हैं और कपड़े भी धो लेते हैं। तभी एक व्यक्ति आया और बोला, “मुझे तो इतना पानी मिल जाता है कि सभी कार्यों के बाद भी बच रहता है, तब मैं उसे अपने घर के बाहर लगे पौधों में भी डाल देता हूँ।

सभी गांव वालों की बातें सुनकर मुखिया ने सोचा कि साधु तो कह रहे थे कि सबको पूरा बर्तन भरकर पानी देंगे तो ऐसी क्या बात है कि किसी को कम तो किसी को ज्यादा पानी मिल रहा है।इसका उत्तर जानने के लिए मुखिया तुंरत साधु के पास गए जिन्होंने गांव के किनारे अपनी कुटिया बना ली थी। मुखिया ने साधु को सभी बातें बतायीं और पानी कम या ज्यादा मिलने का कारण पूछा।साधु धीरे से मुस्काये और बोले, “यदि आप इस रहस्य को जानना चाहते हैं तो कल गांव के सभी लोग शाम के समय मेरे पास अपने अपने पानी के बर्तन लेकर आएं। कल मैं पानी शाम को यही पर दूंगा।मुखिया तुरंत गांव गया और सभी को कल शाम अपने अपने बर्तन के साथ साधु की कुटिया पर पहुंचने को कहा।अगला दिन आया, शाम हुई, सभी अपने अपने बर्तन लेकर साधु की कुटिया पर पहुंच गए। जब सभी लोग एक साथ इकट्ठे हुए तो सभी एक दूसरे की तरफ न देखकर एक दूसरे के बर्तनों को बड़े ही आश्चर्य से देख रहे थे।मुखिया बोला, अरे यह क्या, सभी के बर्तन तो एक जैसे नहीं हैं, कोई बाल्टी लाया है तो कोई सुराही लाया है, कोई ड्रम लाया है तो कोई लकड़ी का बना बड़ा टैंक लाया है। अब समझ आया कि सभी को पानी कम या ज्यादा क्यों मिल रहा था।तभी पास खड़े साधु बोले, “मैंने आपसे कहा था कि मैं सभी को बर्तन भरकर पानी दूंगा। और मैंने ऐसा ही किया। लेकिन कमी आपमें से उन लोगों की रही जो छोटे आकार के बर्तन लाये और समझदारी उन लोगों की रही जो बड़े बड़े बर्तन लाये। मैं तो सभी को पूरा बर्तन भरकर पानी दे रहा हूँ।सभी गांव वाले अब अगले दिन से बड़ा बर्तन घर के बाहर रखने की बात सोचने लगे।तब साधु बोला, आखिर कब तक आप मुफ्त में मिलने वाले पानी को पीते रहेंगे। जिस प्रकार मैंने बर्तन के आकर के हिसाब से आपको पानी दिया, जिसका जितना बड़ा बर्तन उसको उतना ज्यादा पानी मिला। यही बात आपकी सोच पर भी लागू होती है। जिसकी जितनी बड़ी सोच होगी, वह प्रकृति से उतना ही ज्यादा प्राप्त कर सकेगा। प्रकृति आपको उतना ही देती है जितनी बड़ी आपकी सोच होती है।गांव में पानी की कमी है, ऐसे में आपकी सोच थी कि गांव ही छोड़ दिया जाये जिस प्रकार कोई व्यक्ति परेशानी का समाधान न मिलने पर जीवन छोड़ने के बारे में सोचने लगता है। अब जिस प्रकार आपको अधिक पानी पाने के लिए अपने बर्तन को बड़ा करने की जरुरत है, उसी प्रकार गांव में पानी लाने के लिए आपको अपनी सोच को बड़ा करना होगा।गांव के लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे। साधु के द्वारा दी गई सीख को अब गांव का प्रत्येक व्यक्ति समझ चुका था। वह समझ चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है।गांव के लोग एक जगह एकत्रित होकर गांव में पानी लाने के नए नए विचार एक दूसरे को देने लगे। नयी संभावनाएं जन्म लेने लगीं। नए और बड़े विचार आने लगे। गांव के लोगों की सोच बढ़ने लगी।

अब उनकी सोच गांव से निकलकर वहां पहुंच गई जहाँ बहुत बड़ी नदी थी जो गांव से दूर थी। अब गांव के सभी लोग कुछ बड़ा करने की सोचने लगे। तीन दिनों में ही एक बहुत बड़ा निर्णय लिया गया।

गांव से नदी तक के लिए खुदाई शुरू हो गई। चार महीनों की कठिन मेहनत के बाद एक नहर नदी से गांव तक खोदी जा चुकी थी। पानी की लहरें अब गांव तक उछल कूद कर रही थीं। लोग साधु को धन्यवाद देने उनकी कुटिया पर पहुंचे लेकिन साधु अब वहां नहीं मिले। गांव वाले समझ गए कि अब साधु वहां गए होंगे जहाँ के लोगों को उनकी अब बहुत जरुरत होगी।
ये कहानी आपकी सफलता पर आधारित है और समस्त फोटो गूगल इमेज से लिए गए हैं .

Wednesday, 19 July 2017

ऐसा चायवाला जो रोजाना खिलाता है मुफ्त में 300 लोगों को भोजन ,दिल को दहला देने वाली सच्ची कहानी


ऐसा चायवाला जो रोजाना खिलाता है मुफ्त में 300 लोगों को भोजन ,दिल को दहला देने वाली सच्ची कहानी 

मै भोपाल का रहने वाला चाय की दूकान चलाने वाला मामूली सा इंसान हूँ। २०१३ की बात है जब अल्लाह के रहमो करम से मेरी दूकान ठीक ठाक चल रही थी। मेरी दूकान पर अक्सर गरीब लोग ही आया करते थे। उन लोगों से पैसे लेकर मै उन्हें चाय तो पिलाता ,पर उन्हें देख कर मुझे ऐसा लगता कि ये लोग भूखे है और खाना न मिलने के कारण ,अपनी भूख मिटाने के लिए चाय पीने आते है। मैंने अपने शक को कई बार उनसे पूंछ कर पुख्ता किया। मै मन ही मन में बड़ा दुखी होता और सोचता कि मेरा जैसा चाय वाला आखिर उनके लिए कर भी क्या सकता। फिर भी मुझसे जो हो सका मैंने शुरुआत की और नाश्ते के साथ चाय मुफ्त देनी शुरू कर दी।

 हालाँकि मेरी कमाई में इस से ज्यादा नेकी की गुन्जईस नही थी ,पर इतने से मेरा मन नही मान रहा था। दरअसल गरीबों की भूंख ने मेरी जिन्दगी की परेशानियों को बौना सवित कर दिया। नतीजन सबकुछ अल्लाह पर छोड़ ,मैंने उन गरीबों का मुफ्त में pet भरने का फैसला लिया। अपने मकसद को पूरा करने के लिए ,जो भी हमारी दूकान पर आते मै अपनी आमदनी से उनकी भूख मिटानी शुरू कर दी। चार साल पहले शुरू हुए सफर में मुझे ये नहीं पता था कि ये कितने दिन तक चलेगा। कुदरती तौर पर शुरुआत में मुझे बहुत दिक्कते आयीं,पर मै अपने फैसले पर कायम था। होता ये था कि कभी कभी गरीब जरूरतमंद लोगों की संख्या इतनी ज्यादा हो जाती थी ,कि मेरे द्वारा किया गया इंतजाम काम पद जाता था। मै अपनी पूरी कमी इसी काम में खर्च करने लगा जिससे मेरे घर की हालत खराब हो गयी। कभी कभार तो मेरी गुल्लक खाली हो जाती तो मै अपने घर से पैसे लाकर उन्हें भोजन कराता। इस वजह से मेरे परिवार के लोग भी मुझ पर गुस्स्सा करते। देखते देखते मेरे अभियान को दूसरे लोगों से भी सहयोग मिलाने लगा।

उन लोगों के दान ने मेरे हाथों को और भी ताकतवर बना दिया,जिससे गरीवों की थाली मेरे हांथों में मजबूती से टिकी रहे। लोगों की मदद का का ही नतीजा है कि आज मैंने गरीबों के लिए लंगर -ए -आम नाम से एक रसोई की शुरुआत की है जिसमे आज रोजाना 300 लोग मुफ्त में खाना खाते हैं। लंगर ए आम में ज्यादातर लोग गरीब तबके से होते है ,जिनमे फुटपाथ पर रहने वाले ,कूड़ा बीनने वाले ,ठेला या रिक्शा चालक ,भिखारियों के साथ दूरदराज के गांवों से आये ऐसे गरीब लोग ,जो शहर में या तो मजदूर हैं या नौकरी की तलाश में आये हुए रहते हैं.मुझे अपने काम से बेहद खुसी मिलती है,और न जाने कितने भूखे इंसानों की दुआएं मुझे इसी काम के लिई नसीब हुई होंगी। आज शहर के कई नेक लोग मेरे पास आकर मुझे मेरे काम के लिए मदद देते है। इन्हीलोगों की बदौलत मै सैकड़ों लोगों को रोजाना खाना खिलाने के काविल हुआ हूँ। तमाम अडचनों के बावजूद मैंने गरीब लोगों के लिए कुछ करना चाहा और करके दिखाया। मेरा मानना है कि अगर हर इन्सान अपनी आमदनी से एक गरीब को खाना खिलाये। तो हमारे मुल्क में कोई भी गरीब आदमी भूँखा नहीं सोयेगा। हेल्प इंडिया ऐसे लोगो को सलाम करता है ,जिन्हें अपने से ज्यादा दूसरों की फिक्र है। ये लेख अमर उजाला के प्रवाह पेज से लंगरे ए आम में हर भूखे के लिए रोटी लेख से प्रेरित है। 

Monday, 17 July 2017

इतना महान रिक्शे वाला जो दिव्यांग ,बुजुर्ग और घायलों से किराया नहीं लेता सच्ची रुला देने वाली कहानी


इतना महान रिक्शे वाला जो दिव्यांग ,बुजुर्ग और घायलों से किराया नहीं लेता सच्ची रुला देने वाली कहानी 

काम भगवान है,शारीरिक रूप से दिव्यांग ,बुजुर्ग व्यक्ति और दुर्घटनाग्रस्त लोग मेरे वाहन में मुफ्त परिवहन का लाभ उठा सकते हैं -यह लिखा है मेरे ऑटो रिक्शा के पीछे। मैने यह फैसला अचानक नहीं लिया है। इसके पीछे एक मार्मिक कहानी है। करीब बीस साल पहले की बात है ,जब मै अपने घर लौट रहा था ,तो मैंने रसूलगढ़ में एक दुर्घनाग्रस्त आदमी को आसपास खड़े लोगों से मदद माँगते देखा। उस आदमी के आस पास अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा थी ,मगर कोई भी उसकी मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहा था। मै अपने ऑटो के साथ पीछे भीड़ में फंसा था ,और चाहकर भी उस जरूरत मंद की मदद नहीं कर सका। बाद में मुझे पता चला कि उस आदमी ने दम तोड़ दिया। उस घटना ने मेरे दिलो दिमाग को इतना झकझोर दिया कि मै रात में सो नहीं सका। मै इस विषय पर सोचने को मजबूर हुआ। मैंने तय किया कि आज से किसी भी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति या कोई भी दूसरा जरूरत मंद मेरी आँखों के समाने दिखा तो मै उसकी मदद विना किसी शर्त के  करूंगा। मै ओडीसा के कटक जिले के नियाली क्षेत्र के अपूजा गाँव  में रहने वाला सैंतालीस वर्षीय ऑटो ड्राइवर  हूँ। आजीविका के लिए मै मै ओडीसा की राजधानी भुवनेश्वर में ऑटो चलता हूँ। बीस साल की उस घटना के बाद मेरा हर दिन उन चन्द लोगों के काम आता है,जो सड़क पर मदद के हकदार होते हैं। चूंकि ऑटो ही मेरी आय और मेरे परिवार के भरण पोषण का जरिया है,इस लिए मै सभी लोगों को मुफ्त यात्रा नहीं करा सकता। फिर भी मै औसतन हर दिन चार पांच लोगों की मदद जरूर करता हूँ। इसके वाबजूद अपने परिवार की जीविका के लिए पांच सौ रुपये प्रतिदिन कमा लेता हूँ। मुझे खुशी है कि मेरे परिवार ने मेरे इस काम के लिए कभी नहीं रोंका ,और न ही इससे मेरे बच्चों की पढाई पर कोई असर पड़ता है,जोकि फिलहाल तीसरी और नवीं कक्षा के छात्र हैं। मेरी पत्नी सस्मिता ने कभी सवाल नहीं किया कि मेरे द्वारा किये जा रहे परोपकार में कितना ईंधन खर्च होता है,वल्कि उसने हमेशा हमारी तारीफ़ की।  परिवार के  इसी समर्र्थन की वजह से अब तक मै करीब सात हजार बूढ़े ,दिव्यांग और दुर्घटनाग्रस्त लोगों को उनके गंतव्य तक निशुल्क पंहुचा चूका हूँ।

 इसी काम की वजह से आज मेरे इलाके नियाली के बाशिंदे मुझसे प्यार करते हैं। उस अनुभव के लिए मेरे पास शब्द नहीं है जब वे मेरे काम की तारीफ करते है। मेरे जैसा मामूली ऑटो ड्राइवर जब बड़े बड़े मुंह से ऐसे प्यार भरे शब्द सुनता हूँ ,तो लगता है कि मै कितना अमीर इंसान हूँ। इसके आलावा उनकी दुआओं को भी मै अपनी अमूल्य संपत्ति मानता हूँ ,जिसकी मदद मै करता हूँ। साथ ही मै सामान्य यात्रियों से ज्यादा किराया नहीं लेता। मैं यह तो नहीं मानता कि मेरा काम बहुत बड़ा है ,लेकिन मैंने अपने साथ काम करने वाले दुसरे कई ड्राइवरों को ऐसे तमाम मौकों पर इंसानियत से दूर जाते हुए भी देखा है। मै चाहता हूँ कि मेरे काम का और दूसरे लोग भी अनुसरण करें ,जिससे हम अपने समाज और देश में सकारात्मकता को प्रोत्साहित कर सकें।
ये लेख अमर उजाला के प्रवाह पेज से लिया गया है .

Sunday, 16 July 2017

राष्ट्रपति चुनाव २०१७, आइए जानते है राष्ट्रपति भवन का इतिहास


राष्ट्रपति चुनाव २०१७, आइए जानते है राष्ट्रपति भवन का इतिहास 

राष्ट्रपति भवन भारत सरकार के राष्ट्रपति का सरकारी आवास है। सन १९५० तक इसे वाइसरॉय हाउस बोला जाता था। तब यह तत्कालीन भारत के गवर्नर जनरल का आवास हुआ करता था। यह नई दिल्ली के हृदय क्षेत्र में स्थित है। इस महल में ३४० कक्ष हैं और यह विश्व में किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के आवास से बड़ा है। वर्तमान भारत के राष्ट्रपति, उन कक्षों में नहीं रहते, जहां वाइसरॉय रहते थे, बल्कि वे अतिथि-कक्ष में रहते हैं। भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल श्री सी राजगोपालाचार्य को यहां का मुख्य शयन कक्ष, अपनी विनीत नम्र रुचियों के कारण, अति आडंबर पूर्ण लगा जिसके कारण उन्होंने अतिथि कक्ष में रहना उचित समझा। उनके उपरांत सभी राष्ट्रपतियों ने यही परंपरा निभाई। यहां के मुगल उद्यान की गुलाब वाटिका में अनेक प्रकार के गुलाब लगे हैं और यह कि जन साधारण हेतु, प्रति वर्ष फरवरी माह के दौरान खुलती है। इस भवन की खास बात है कि इस भवन के निर्माण में लोहे का नगण्य प्रयोग हुआ है।

अभिकल्पना

दिल्ली दरबार के वर्ष १९११ में भारत की राजधानी को तत्कालीन कोलकत्ता से स्थानांतरित कर दिल्ली लाने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय १२ दिसंबर को जॉर्ज पंचम द्वारा घोषित किया गया। इस योजना के तहत गवर्नर जनरल के आवास को प्रधान और अतीव विशेष दर्जा दिया गया। ब्रिटिश वास्तुकार सर एड्विन लैंडसियर लूट्यन्स को, जो कि नगर योजना के प्रमुख सदस्य थे, इस इमारत स्थल की अभिकल्पना का कार्यभार सौंपा गया। इसके मूल योजना के अनुसार, कुछ ऐसा बनाना था, जो कि पूर्वीय और पाश्चात्य शैली का मिश्रण हो। कुछ लोगों की राय में यह महल परंपरागत शैली का होना चाहिये था, जो कि प्राचीन यूनानी शैली में होता। लेकिन यह भारत में स्पष्टतः पाश्चात्य शक्ति प्रदर्शन होता, जो कि अमान्य था। वहीं दूसरी ओर कई लोगों का मत था, कि यह पूर्णातया भारतीय शैली का हो। इन दोनों के मिश्रण के कई अनुपात भी प्रस्तावित थे। तब वाइसरॉय ने कहा, कि महल परंपरागत होगा, परंतु भारतीय मोटिफ के बिना। यही वह अभिकल्पना थी, जो कि मूर्त रूप में आज खड़ी है। यह महल लगभग उसी रूप में बना, जो कि लूट्यन्स ने बेकर को शिमला से १४ जून १९१२ को भेजा था। लूट्यन्स की अभिकल्पना वृहत रूप से परंपरागत थी, जो कि भारतीय वास्तुकला से वर्णमेल, ब्यौरे, इत्यादि में अत्यधिक प्रेरित थी, साथ ही वाइसरॉय के आदेश के अनुसार भी थी। लूट्यन्स और बेकर, जिन्हें वाइसरॉय हाउस और सचिवालयों का कार्य सौंपा गया, उन्होंने आरम्भ में काफी सौहार्द से कार्य किया, लेकिन बाद में झगड़े भी। बेकर को इस भवन के आगे बने दो सचिवालयों की योजना का कार्य दिया गया था। आरम्भिक योजनानुसार वाइसरॉय हाउस को रायसिना की पहाड़ी के ऊपर बना कर दोनों सचिवालय नीचे बनाने थे।

 बाद में सचिवालयों को ४०० गज पीछे खिसकाकर पहाड़ी पर ही बनाना तय हुआ। लूट्यन्स की योजनानुसार यह भवन अकेला ऊंचाई पर स्थित होता, जिसे कि सचिवालयों के कारण अपने मूलयोजना से पीछे सरकना पड़ा, साथ ही आगे दोनों सचिवालय खाड़े हो गये, जिससे कि वह दृष्टि में कूछ दब गया। यही उनके विवाद का कारण था। इस महल के पूर्ण होने पर लूट्यन्स ने बेकर से अच्छी लड़ाई की, क्योंकि यकीनन वाइसरॉय हाउस का दृश्य, सड़क के उच्च कोण के कारण बाधित हो गया था। लूट्यन्स ने इस विवाद को बेकरलू (वाटरलू के युद्ध के सन्दर्भ में) के स्तर का माना। लेकिन भरपूर प्रयास के बावजूद इसे बदलवा नहीं पाया। वह चाहता था, कि भवन से नीचे तक एक लम्बी ढ़ाल पर सड़क आये, जिससे कि भवन का दृश्य ना बाधित हो, एवं दूर से भी दृश्य हो। सन १९१४ में बेकर और लूट्यन्स सहित बनी एक समिति मं तय हुआ, कि सड़क की ढ़ाल २५ में १ हो, जो बाद में केवल २२ में १ बनी। इससे अधिक खड़ी ढ़ाल भवन के दॄश्य को और बाधित करती। लूट्यन्स यह जानता था, कि यह ढ़ाल भी इसके दृश्य को पूर्णतया नहीं दिखा पायेगी। तब उसने इसे कम कराने का निवेदन किया। सन १९१६ में इम्पीरियल दिल्ली समिति ने लूट्यन्स के इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। लूट्यन्स ने तब भी यही समझा कि बेकर सरकार को खुश करके और पैसे बनाने में अधिक लगा था, ना कि अच्छी श्रेणी की वास्तु रूपांकन में ध्यान केद्रित करने में। लूट्यन्स ने भारत और इंगलैंड की बाइस वर्षों में लगभग प्रतिवर्ष यात्रा की, दोनों स्थानों की वाइसरॉय इमारत बनाने हेतु। उसे लॉर्ड हार्डिंग के बजट नियंत्रण के कारण इमारत के आकार को कई गुणा छोटा भी करना पड़ा। लॉर्ड हार्डिंग ने यद्यपि खर्चे नियंत्रित कर कीमत घटाने के निर्देश दिये थे। तथापि वह चाहते थे, कि कूछ निश्चित मात्रा में तो इमारत में वैभव दर्शन हों ही।

भारतीय रूपांकन

इमारत के ऊपर भारतीय स्थापत्यकला का एक अभिन्न अंग है छोटे गुम्बदनुमा ढांचे - छतरी। इमारत में विभिन्न भारतीय डिज़ाइन डाले और जोड़े गये। इनमें ढेरों गोलाकार परात/कुण्ड रूपी घेरे हैं (चित्रित), जो कि भवन के ऊपर लगे हैं और जिनमें पानी के फौव्वारे भी लगे हैं, वे भारतीय स्थापत्य के अभिन्न अंग हैं। यहां परंपरागत बारतीय छज्जे भी हैं, जो कि आठ फीट दीवार से बाहर को निकले हुए हैं और नीचे पुष्पाकृति से सम्पन्न हैं। ये भवन को सीधी धूप के खिड़कियों में पड़ने से और मानसून में वर्षा के जल और फुहार को जाने से रोकते हैं। छत के ऊपर बनीं कई छतरियां, बवन की छत के उस भाग को, जहां मुख्य गुम्बद नहीं बना है, वहां के सपाट दृश्य होने से रोकतीं हैं। लूट्यन्स ने कई भारतीय शैली के नमूनों को उपयुक्त स्थानों पर प्रयुक्त किया है, जो कि काफी प्रभावशाली हैं। इनमें से कुछ हैं, बाग में बने नाग, स्तंभों पर बने सजे धजे हाथी (चित्रित) और छोटे खम्भों पर लगे हुए बैठे हुए सिंह (चित्रित)। ब्रिटिष शिल्पकार चार्ल्स सार्जियेन्ट जैगर, जो कि अपने बनाये कई युद्ध स्मारकों के लिये जाने जाते हैं, ने बाहरी दीवारों पर बने हाथियों की सजावट की थी।

 इसके साथ ही जयपुर स्तंभ के निकट का पूर्ण बास रिलीफ भी उन्हीं ने बनवाया था। लाल बलुआ पत्थर से बनी जालियां भी भारतीय स्थापत्य से प्रेरित थीं। भवन के आगे की ओर, पूर्वी ओर, बारह असमान स्थित स्तंभ हैं, जिनपर ऊपर की ओर, खड़ी रेखाओं का बॉर्डर है और अकैन्थस की पत्तियों सहित बेक बनी है, जिसके संग चार पैन्डेन्ट रूप में घंटी बनी है, जो कि भारतीय हिन्दू धर्म के मंदिरों का एक अनिवार्य अंग हैं। प्रत्येक स्तंभ के प्रत्येक ऊपरी कोण पर एक घंटी बनी है। यह कथित था, कि क्योंकि ये घंटियां शांत हैं, इसलिये भारत में ब्रिटिश राज्य समाप्त नहीं होगा। प्रासाद के सामने की ओर कोई खिड़की नहीं है, सिवाय किनारों की ओर बनी हुई वाली के। लूट्यन्स ने भवन में कुछ व्यक्तिगत प्रभाव भी डाले हैं, जैसे कि उद्यान की दीवार में एक स्थान और स्टेट कक्ष में दो रोशनदान, जो कि चश्में जैसे प्रतीत होते हैं।

यह भवन मुख्यतः १९२९ में, बाकी नई दिल्ली के साथ ही, पूर्ण हो गया था और इसका आधिकारिक उद्घाटन सन १९३१ में हुआ था। यह एक रोचक तथ्य है, कि यह भवन सत्रह वर्शःओं में पूर्ण हुआ और सत्रह वर्ष ही ब्रिटिश राज्य में रह पाया,। अपने निर्माण पूर्ण होने के अठ्ठारहवें वर्ष ही, यह स्वतंत्र भारत में आ गया। १९४७ में, भारतीय स्वतंत्रता के बाद, तत्कालीन वाइसरॉय वहां रहते रहे और अंततः १९५० में भारतीय गणतंत्रता के बाद से यहां भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति रहने लगे और इसका नाम बदल कर राष्ट्रपति भवन हो गया। इसका गुम्बद, लूट्यन्स के अनुसार रोमन पैन्थेयन से प्रेरित बताया गया था। वैसे यह मूलतः मौर्य काल में बने सांची स्तूप, सांची, मध्य प्रदेश से व्युत्पन्न है। यहां यूरोपियाई और मुगल स्थापत्यकला के घटक भी हैं। सम्पूर्णतः यह भवन अन्य ब्रिटिश इमारतों से एकदम भिन्न है। इसमें ३५५ सुसज्जित कक्ष हैं। इसका भूक्षेत्र फल २,००,००० वर्ग फीट (१९००० वर्ग मीटर) है। इस भवन में ७०० मिलियन ईंटें अओर ३.५ मिलियन घन फीट (८५००० घन मीटर) पत्थर लगा है, जिसके साथ लोहे का न्यूनतम प्रयोग हुआ है।

खाका

प्रासाद का खाका, एक वृहत वर्ग से बनाया गया है। यद्यपि यहां अनेकों आंगन और अंदरूनी खुले क्षेत्र हैं। यहां वाइसरॉय के लिये पृथक स्कंध है और अभ्यागतों के लिये पृथक स्कंध है। वाइसरॉय स्कंध अपने आप में, एक अलग चार मंजिला मकान है, जिसमें अपने स्वयं के आंगन हैं। यह इतना बड़ा है, कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद ने यहां ना रहकर, पाहुना स्कंध में रहना पसंद किया। यही परंपरा उनके उत्तराधिकारियों द्वारा भी अनुगमित हुई। प्रासाद के मुख्य भाग के केन्द्र में, मुख्य गुम्बद के ठीक नीचे है – दरबार हॉल, जिसे ब्रिटिश काल में राजगद्दी कक्ष कहा जाता था। तब यहां वाइसरॉय और उनकी पत्नी के लिये राजगद्दियां होती थीं। इस कक्ष का अंतस अनलंकृत है, जो कि यहां के पाषाण नक्काशी को, बजाय पेचीदा सजावट के, उजागर करने हेतु किया गया है। ऐसे ही अधिकांश कक्षों में किया गया है।

यहां के स्तंभ भी बाहर के मुख्य स्तंभों की भांति ही, ऊपर घंटी और खड़ी रेखाओं वाले बॉर्डर सहित हैं। दीवारों के ऊपर यही बॉर्डर भी हैं। कक्ष के बीच में एक दो टन भार का झाड़-फानूस (शैन्डेलियर) लगा है, जो कि ३३ मीटर ऊंची छत से लटकता है। इस विशाल कक्ष के चारों कोणों पर स्थित है एक कक्ष प्रति कोण। इनमें से दो स्टेट ड्रॉविंग कक्ष हैं, एक स्टेट अपर कक्ष और एक स्टेट पुस्तकालय हैं। अन्य कक्ष गलियारे जैसे भी हैं, जो कि एक ओरखुले हैं। ये नीचे आंगन में खुलते हैं। एक वृहत भोजन कक्ष, बैठक कक्ष, बिलियर्ड्स कक्ष और एक बड़ा बॉल कक्ष और कई जीने हैं। प्रासाद में सर्वत्र कई स्थानों पर जल के फव्वारे और बेसिन बने हैं, जिनमें से कुछ वाइसरॉय के आसन की सीध्इयों के पास भी हैं। इनमें आठ संगमर्मर के शेर छः जल बेसिनों में पानी डालते हुए बने हैं। यह सिंह ब्रिटेन के सूचक थे। इनमें से एक कक्ष की खुली छत भी है, जो कि प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक प्रकाश देती है।

मुगल उद्यान


राष्ट्रपति भवन के पिछवाड़े मुगल गार्डन अपने किस्म का अकेला ऐसा उद्यान है, जहां विश्वभर के रंग-बिरंगे फूलों की छटा देखने को मिलती है। मैसूर के वृन्दावन गार्डन को छोड़कर शायद ही और कोई उद्यान इसके मुकाबले का होगा। यहां विविध प्रकार के फूलों की गजब की बहार है। अकेले गुलाब की ही 250 से भी अधिक किस्में हैं। मुगल गार्डन की परिकल्पना लेडी हार्डिंग की थी। उन्होंने श्रीनगर में निशात और शालीमार बाग देखे थे, जो उन्हें बहुत भाये। बस तभी से मुगल गार्डन उनके जेहन में बैठ गया था। भारत के अब तक जितने भी राष्ट्रपति इस भवन में निवास करते आए हैं, उनके मुताबिक इसमें कुछ न कुछ बदलाव जरूर हुए हैं। प्रथम राष्ट्रपति, डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने इस गार्डन में कोई बदलाव नहीं कराया लेकिन उन्होंने इस खास बाग को जनता के लिए खोलने की बात की। उन्हीं की वजह से प्रति वर्ष मध्य-फरवरी से मध्य-मार्च तक यह आकर्षक गार्डन आम जनता के लिए खोला जाता है।

जयपुर स्तंभ


भवन के ठीक सामने से एक मार्ग नारंगी बदरपुर बजरी से ढंका हुआ सीधा लोहे के मुख्य द्वार रूपी फाटक तक जाता है, जो कि उस फाटक से होता हुआ, दोनो सचिवालयों, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक के बीच से हो कर लाल दीवारों के बीच से नीचे उतरता है और विजय चौक से होता हुआ, राजपथ कहलाता है। यह मार्ग इंडिया गेट तक जाता है। इस रास्ते के भवन से फाटक की दूरी के ठीक बीचो बीच खडआ है एक पत्थर का गुलाबी और लाल स्तंभ, जो काफी ऊंचा है और उसपर जयपुर के तत्कालीन महाराजा द्वारा भेजा गया एक चांदी का शुबकामना प्रतीक इसपर ऊपर लगा है| इस कारण इसे जयपुर स्तंब कहा जाता है| इस स्तंब के उत्तर और दक्षिण ओर्, नीचे सीढियां उतरकर दो सड़कें लगभग २०० मीटर तक जातीं हैं और बाहरी वघेरे के पाटकों संख्या ३७ और ३५ में जा मिलतीं हैं|

गुम्बद


मध्यवर्ती गुम्बद भारतीय और ब्रिटिष शैलियों का सम्मिश्रण है। केन्द्र में एक ऊंचा ताम्र गुम्बद है, जो कि एक समग्र इमारत से अलग दिखाई देता है और एक ऊंचे ढ़ोलाकार या बेलनाकार ढांचे के ऊपर स्थित है। भवन के चारों कोनों के बीच कर्णरेखाओं के मध्य में यह गुम्बद स्थित है।

यह पूरे भवन की ऊंचाई की दुगुनी ऊंचाई का है। सन १९१३ के भवन की योजना में जो इसकी ऊंचाई थी, उसे लॉर्ड हार्डिंग द्वारा बढ़ाया गया था। इस गुम्बद में परंपरागत और भारतीय शैलियों का मिश्रण है। लूट्यन्स के अनुसार, यह रूप रोम के पैन्थियन से उभरा है, लेकिन यह भी बहुत सम्भव है, कि इसको सांची स्तूप की प्रेरणा पर बनाया गया हो। इस गुम्बद घेरे हुए एक द्वार मण्डप (पोर्च) बना हुआ है, जिसमें समान स्थित स्तंभ हैं, जो कि गुम्बद को उठाए हुए हैं और इन स्तंभों के बीछ खाली स्थान है। यह गुम्बद के हरेक ओर, सभी दिशाओं में हैं। इस के कारण ही, यह गुम्बद किसी भी कोण से देखने पर, यदि गर्मी के धुंधले मौसम में देखें, तो तैरता हुआ प्रतीत होता है। बाहरी गुम्बद की रेनफोर्स्ड कांक्रीट सीमेंट निर्मित गुम्बद, सन १९२९ के लगभग अपना आकार लेने लगा था। इस गुम्बद का अंतिम पाषाण ६ अप्रैल १९२९ को लगाया गया था। यद्यपि इसके ऊपर ताम्र आवरण सन १९३० तक नहीं लगा था।

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Friday, 14 July 2017

एक बाज जो जो अपनी औकात भूल गया था ,पढ़े जमीर जगा देने वाली कहानी


एक बाज जो जो अपनी औकात भूल गया था ,पढ़े जमीर जगा देने वाली कहानी 

बहुत समय पहले की बात है ,एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये ।वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया ,और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था।राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो ।आदमी ने ऐसा ही किया। इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे ,पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था ,वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था। ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा,क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ।राजा ने सवाल किया कि बाज कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर क्यों बैठ गया जिससे वो उड़ा था। जी हुजूर इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दूसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया,कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे ,पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था। अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा ,मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। किसान बोला मालिक,मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदी हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं।लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदी हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को, भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये ,कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हैं ।