खुश जिंदगी, खुशी जहान

जिंदगी का असली मतलब खुशियों में ही होता है। चाहे पैसे की कमी हो और जीवन पूरी तरह से खुश हो तो दुनिया की किसी और चीज की जरूरत नहीं पड़ती।

अच्छी हेल्थ है तो खुशियां तमाम है

अगर भोजन में अच्छे पोषक तत्वों वाली चीजों का उपयोग किया जाएगा तो शरीर स्वस्थ रहता है। स्वस्थ रहने से बड़ी दुनिया की कोई खुसी नहीं है।

नपुंसकता से डरें नहीं हमारे एक्सपर्ट की राय लें

स्तंभन दोष (ईडी) (नपुंसकता या इरेक्टाइल डिसफंक्शन एक ऐसी समस्या है जो शारीरिक रूप से अंतरंग संबंध बनाने के दौरान आपको आती है। जब ऐसा होता है तो रिश्ते में दरार आ सकती है। स्तंभन दोष पुरुषों के लिए एक बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति है।

सगे सम्बन्धियों से हो गया है प्यार, हमारे एक्सपर्ट करेंगे उद्धार

अगर आपको भी अपने किसी सगे सम्बन्धी से प्यार हो गया है या हालात ज्यादा नाजुक है तो हमारे ईमेल पर लिख भेजें अपनी समस्या। हमारे एक्सपर्ट देंगे सही राय। आपकी जानकारी भी रखी जाएगी गोपनीय।

असफलताओं से न हो निराश, हमारे एक्सपर्ट करेंगे नैया पार

अगर आप भी बार -बार असफल हो रहे हैं तो निराश न हो हमारे एक्सपर्ट आपकी फ्री में मदद करने के लिए तैयार हैं। आप अपनी समस्या ईमेल पर लिख भेजे और फिर इसके बाद असफल;असफलायें आप से दूर भागने लगेंगीं।

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Sunday, 1 October 2017

किसी प्रकार के गंजे सिर पर 100% बाल उगाने का रामबाण अचूक उपाय, तमाम लोगों पर आजमाया हुआ


किसी प्रकार के गंजे सिर पर 100% बाल उगाने का रामबाण अचूक उपाय, तमाम लोगों पर आजमाया हुआ 


हेल्प इंडिया। दोस्तों आज मैं आप को गंजे में बाल उगाने का रामबाण 100 प्रतिशत उपाय बताने जा रहा हूँ। जिससे किसी भी प्रकार का गंजापन हो सभी में ३० दिन में सिर पर बाल उगा सकते हैं।
आवश्यक सामग्री
1-२५० ग्राम चिरमिटी /रत्ती /गुच्छ /घुंघुची ,ये सभी इसी के नाम हैं। यह सफेद और लाल या काले रंग की होती है। पंसारी की दूकान पर आसानी से मिल जाती है। सफेद रंग की मिले तो वह ले अगर यह न मिले तो लाल काले रंग की ले लें।
चमत्कारी तेल बनाने का तरीका 
1-इसे बारीक पीस कर पाउडर बनाकर छान लें ,छानने के बाद ऊपर जो भूसी अर्थात मोटा अंश बचे उसे फेंके नहीं।
2-अब छने हुए पाउडर में से ५० ग्राम पाउडर निकाल लें।
3-अब बचे हुए २०० ग्राम पाउडर को लगभग 1.5 लीटर पानी में जब तक उबाले जब ५०० ग्राम बच जाए। 4- अब इस पानी को छानकर रख लें।

5-एक लोहे की कढ़ाई में २०० ग्राम तिल का तेल ले  यदि तिल का  तेल न मिले टी सरसों का तेल भी ले सकते हैं ,लेकिन याद रहे तिल का तेल ज्यादा उत्तम रहता है। अब ५०० मिली लीटर चिरमिटी उबाल कर छाना हुआ पानी व 50 ग्राम चिरमिटी का बचा हुआ पाउडर ठन्डे तेल में मिला लें। ध्यान रहे गरम तेल में कुछ नहीं डालना है यह नुकसानदायक हो सकता है। अब इस ठन्डे तेल में मिली सामग्री को धीमी आंच पर फिर से पकाएं।
6-पकाने के उपरान्त तेल में से पानी लगभग जल जाये ,तब यह टेस्ट करने के लिए की सारा पानी जल गया है की जांच ले लिए एक लोहे का टुकड़ा या बांस की झाडू की सींक लें और उस पर काटन का फोया तेल में भिगोकर आग पर रखें। अगर चटर -पटर की आवाज आये तो समझे की अभी पानी की मात्रा तेल में है। इस स्थिति में उसे धीमी आंच पर और गरम करें।

7-जब सारा पानी जल जाय तो इसे चूल्हे से उतार कर टोप जैसे स्टील के बर्तन में रख दें। जब यह ठंडा हो जय और काला अंश नीचे बैठ जाय। तब इस तेल को कांच की सूखी बोतल में रख लें ,जिसमे पानी का अंश न हो।
तेल की प्रयोग विधि 
1-तेल को सिर पर सुबह शाम लगाएं और पांच मिनट तक मालिश करें। 2-तेल प्रयोग के समय कोइ साबुन और शैंपू का प्रयोग बिलकुल न करें ,बाल धोने के लिए खट्टा दही या नीबू का प्रयोग करें।
3-हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वाश है कि एक महीने बाद आपको निराश नहीं होना पडेगा ,और आपकी इच्छानुसार परिणाम मिलाने शुरू हो जायेगे। इसका प्रयोग मैंने जिस पर किया है उससे हमें 100 % परिणाम मिला है।   

Saturday, 5 August 2017

टीबी T.B. (tuberculosis) रोग का रामबाण घरेलू और आयुर्वेदिक उपचार 2 माह में जड़ से खत्म करें ये रोग

टीबी T.B. (tuberculosis) रोग का रामबाण घरेलू और आयुर्वेदिक उपचार 2 माह में जड़ से खत्म करें ये रोग 


दोस्तों आज मै आप लोगों को टीबी बीमारी को दो माह में जड़ से खत्म करने के कुछ घरेलू उपाय बताने जा रहा हूँ। 100 ग्राम मक्खन लेकर उसमें 25 ग्राम शुद्ध शहद मिलाकर नित्य सुबह के समय सेवन करें। शहद व मक्खन शरीर के क्षय को रोकते हैं।लौंग का चूर्ण शहद में मिलाकर भोजन के बाद चाटें।लहसुन के रस के साथ आधा चम्मच शहद मिलाकर चाटें तथा लहसुन के रस को सूंघें। यह रस फेफड़ों को मजबूत करता है।फेफड़ों को शक्ति पहुंचाने के लिए कच्चा नारियल खाना चाहिए।एक पाव दूध में 5 पीपल डालकर उबालें। फिर इस दूध को सुबह-शाम के समय पिएं।कच्ची लौकी को कद्दूकस में कस लें। फिर इसे एक उबाल देकर इसमें शक्कर मिलाकर खाएं।बेर को कुचलकर पानी में उबालें। फिर शक्कर डालकर इसका सेवन करें।50 ग्राम अखरोट की गिरी और 3 पूतियां लहसुन की छीलकर, दोनों को पीस लें। फिर इसे देसी घी में भूनकर खाएं।केले के तने का रस निकालकर तथा छानकर एक कप तैयार कर लें। फिर इसे नित्य सेवन करें। लगभग 40 दिन तक बराबर सेवन करने से टी.बी. का रोग जाता रहता है।पीपल की गुलड़ियों (फलों) को सुखाकर पीस लें।

 फिर इस चूर्ण की 8 ग्राम मात्रा प्रतिदिन ताजे दूध के साथ सेवन करें।लहसुन की दो-तीन कलियां सुबह को कच्ची चबा जाएं। एक माह में टी.बी. जैसा रोग खत्म हो जाएगा।टी.बी. के साथ यदि ज्वर रहता है, तो तुलसी की 4 पत्तियां, चुटकी भर नमक, आधा चम्मच जीरा, एक चम्मच सोंठ। सबको एक कप पानी में उबालकर उसकी चाय बनाकर पिएं।क्षय रोगियों के लिए अंगूर रामबाण औषधि है। नित्य 100-200 ग्राम अंगूरों का सेवन करें।मुनक्के के 4 दाने, चार पीपल, 10 ग्राम खांड़। इन सबको पीसकर चटनी बना लें। इसका सेवन सुबह-शाम के समय करें।गुलाब के फूलों को सुखाकर, उसमें गुड़ मिलाकर 5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करें।बकरी के दूध में आधा चम्मच सोंठ डालकर गर्म करें। दिन भर में आधा लीटर पिएं।सेब का मुरब्बा नित्य सेवन करें।4-5 लहसुन की कलियों को दूध में उबालें। फिर दूध को छानकर पिएं।10-15 ग्राम मछली का तेल (काड लिवर आइल) दूध में डालकर नित्य पिएं।कसा हुआ 25 ग्राम कच्चा नारियल, लहसुन की चटनी 6 ग्राम तथा बकरी का दूध 250 ग्राम, तीनों का हलवा बनाकर खाएं।200 ग्राम बेल की गिरी पानी में पकाएं। पानी जब 50 ग्राम रह जाए, तो उसमें कच्ची खांड़ डालकर सेवन करें।दूध के साथ गुलकंद खाएं।

टीबी का आयुर्वेदिक उपचार


पीपल 5 ग्राम, पीपलामूल 5 ग्राम, धनिया 4 ग्राम, अजमोद 5 ग्राम, अनारदाना 50 ग्राम, मिसरी 25 ग्राम, काली मिर्च 5 ग्राम, बंशलोचन 2 ग्राम, दालचीनी 2 ग्राम और तेजपात 8-10 पत्ते। सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण प्रतिदिन शहद या बकरी/गाय के दूध से सेवन करें।
करेले का एक चुटकी चूर्ण शहद के साथ चाटने के बाद ऊपर से वासावलेह का सेवन करें।मुलेठी, मुनक्का, काली मिर्च, बहेड़ा तथा पिप्पली की समान मात्रा लेकर उन्हें कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण शहद के साथ नित्य सुबह के समय सेवन करें।जीवंती का चूर्ण शहद के साथ चाटने से हर प्रकार का यक्ष्मा जाता रहता है।लौनी घी में शहद मिलाकर खाएं तथा ऊपर से दूध पिएं।अर्जुन की छाल, गुलसकरी तथा कौंच के बीजों को लेकर पीस लें। इसमें थोड़ा-सा घी तथा शहद मिलाकर अवलेह बना लें। नित्य आधा चम्मच अवलेह खाकर ऊपर से दूध पिएं।असगंध तथा पीपल का चूर्ण समान मात्रा में बनाकर एक चुटकी घी या शहद के साथ सुबह-शाम चाटें।शरीर पर लाक्षादि तेल या चंदनादि तेल की मालिश करें।स्वर्ण मालती बसंत 125 मि. ग्रा, श्रृंग भस्म 250 मि. ग्रा, अभ्रक भस्म 125 मि. ग्रा, सितोपलादि चूर्ण 1 ग्राम। इनको मिलाकर ऐसी एक मात्रा तीन बार शहद के साथ लें।द्राक्षासव व वासारिष्ट 10-10 मि. ली. समान मात्रा में जल मिलाकर सुबह-शाम भोजनोपरान्त लें चयवनप्राश 10 ग्राम सुबह-शाम दूध से लें।क्षयगज केसरी या यक्ष्मान्तक लौह में से एक 125 मि.ग्रा. तीन बार मधु से लें।
इस लेख का सोर्स और उद्धरण होमोपैथिक मेडिसिन नामक ब्लॉग से लिया गया है ,लेख में प्रयुक्त समत फोटो गूगल से ली गईं हैं
सोर्स हेतु -यहाँ क्लिक करें 

Sunday, 30 July 2017

अगर आप खा रहे हैं नकली देशी घी तो आप को हो सकती हैं हार्टअटैक जैसी बीमारियाँ जानें पहचान


अगर आप खा रहे हैं नकली देशी घी तो आप को हो सकती हैं हार्टअटैक जैसी बीमारियाँ जानें पहचान

दोस्तों हमारे देश में हर चीज नकली बनाती है ,मगर आज मै देशी घी के बारे में बात करूँगा,मैंने यह जानने की कोशिश की की कि नकली देशी घी किन चीजों से बनाया जाता है है ,जब मुझे मालूम हुआ तो मेरे तो होश ही उड़ गए।  देशी घी तो हड्डियों का चूरा, पशुओं की चर्बी, पाम तेल, और कुछ अन्य खतरनाक केमिकल्स को मिलाकर नकली घी तैयार किया जाता है। जिसके हमें न जाने कितने भयानक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। लेकिन आपकी इस बड़ी परेशानी को आज हम कुछ आसान तरीकों से सुलझा देगें।
मैंने कुछ असली घी बेचने वालों और और हमारे पडौस में रह रहे जानवरों के एक डाक्टर से असली और मिलावटी घी जानने के तरीके पूछे तो उन्होंने हमें ये जानकारी दी। एक चम्मच घी में 5 ml हाइड्रोक्लोरिक एसिड डालें। अगर घी लाल हो जाता है तो समझ जाए कि घी में कोलतार डाई मिलाई गई है। एक चम्मच घी में चार-पांच ड्रॉप्स आयोडीन मिलाने पर इसका रंग नीला हो जाए तो समझ जाएं कि इसमें उबला आलू मिलाया गया है।बाउल में एक-एक चम्मच घी,हाइड्रोक्लोरिक एसिड और एक चुटकी चीनी मिलाएं। अगर घी का रंग बदलकर लाल दिखाई दें तो समझ जाएं कि इसमें डालडा मिला है।थोड़ा सा घी लेकर हाथ में रगडें, फिर इसे सूंघकर देखें। अगर कुछ ही देर में इसकी खुशबू आनी बंद हो जाए तो समझ जाएं की यह मिलावटी है।ये सब जानकर मै हैरान रह गया ,तो मुझे रहा नहीं गया ,और डॉ अमित सक्सेना जी से इस मिलावटी घी के वारे में पूछा ,जब उन्होंने मुझे नकली घी से होने वाले रोगों और समस्यायों के बारे में बताया तो मै कुछ मिनटों के लिए अपने होश खो बैठा ,मैंने सोंचा क्या कोई कुछ रुपयों के खातिर लोगों की जिन्दिगियो से भी खेल सकते है ,और सरकार भी इस पर रोंक नहीं लगा पा रही है

नकली घी खाने से होने वाली हानियाँ 

नकली घी खाने से कभी भी हार्टअटैक आ सकता है। आपका बी.पी बढ़ सकता है और आपकी मृत्यु तक हो सकती है।यदि आप ऐसा घी खाते हैं जिसमें हड्डियों का चूरा मिला हो। इसके कारण स्ट्रोक भी हो सकता है।इससे आपका लिवर भी खराब हो सकता है। इसके कारण कई तरह के कैंसर हो सकते हैं। यदि नियमित तौर पर इसका सेवन किया गया तो ये मूत्रमार्ग और किडनी को खराब कर सकते हैं।यदि घी में लेड जैसे पदार्थ मिले हो तो इसके कारण एनीमिया और ब्रेन से संबंधित समस्याएं भी हो सकती हैं।मिलावट युक्त घी से प्रेगनेंट औरत का गर्भपात होने का खतरा रहता है। इसलिए प्रेगनेंट औरत को हमेशा घर पर ही बनाया हुआ घी खाना चाहिए।यह लेख डाक्टरों और गाय भैस पालने बाले लोगों से प्राप्त जानकारी पर जानकारी पर आधारित है। लेख में प्रयोग की गईं फोटो गूगल से ली गईं हैं जिनका लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है।  

Saturday, 29 July 2017

इन मशरूमों को खाने से हो जाती है मौत आओ पहचानते है जहरीले मशरूम

इन मशरूमों को खाने से हो जाती है मौत आओ पहचानते है जहरीले मशरूम 


जहरीले मशरूम खाने से दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की मौत होती है। खाने लायक मशरूम की पहचान करना आसान नहीं है। एक नजर कुछ घातक मशरूमों पर।
एमैनिटा फैलॉइड्स को डेथ कैप के नाम से भी जाना जाता है। यह सबसे जहरीले मशरूमों में से एक है। सामान्य मशरूम सा दिखने वाला डेथ कैप बहुत तेजी से शरीर को नुकसान पहुंचाता है।

एमैनिटा परिवार में कई तरह के मशरूम आते हैं। एमैनिटा ओवोइडिआ को यूरोपियन व्हाइट एग भी कहा जाता है, इसे खाया जाता है। लेकिन ये दिखने में एमैनिटा प्रॉक्सिमा जैसा ही लगता है।जानकार भी मुश्किल से फर्क कर पाते हैं।एमैनिटा प्रॉक्सिमा बेहद विषैला होता है। ऐसे में एमैनिटा परिवार से दूर रहना ही बेहतर है।किसी छत्र सा दिखने वाला मार्कोलेपियोटा देखने में हूबहू डेथ कैप जैसा भी लग सकता है।

यह लकड़ी और पोषक तत्वों से भरी जमीन पर उगता है.इस तस्वीर में दो तरह के मशरूम हैं। एक को खाया जाता है और दूसरा जहरीला है। लेकिन इनमें फर्क करना आसान नहीं है.

 इसीलिए मशरूम खाने में मामले में तुक्केबाजी नहीं करनी चाहिए।जर्मनी में हर कोई जानता है कि खूबसूरत दिखने वाले इस मशरूम को बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। एमैनिटा मस्केरिया नाम का यह फंगस दुनिया के कई देशों में पाया जाता है। यह श्वसन तंत्र पर हमला करता है।क्लिटोसाइब मशरूम की करीब 100 प्रजातियां खाने लायक हैं, बाकी विषैली। जहरीले मशरूमों में न्यूरोटॉक्सिक तत्व होते हैं जो तंत्रिका तंत्र पर हमला करते हैं।

यह हृदय की मांस पेशियों को भी प्रभावित करता है।एंटोलोमा का विषैला असर, मशरूम की 1000 प्रजातियों में यह पाया जाता है। एंटोलोमा पेट का निशाना बनाता है। इसे खाने वाले उल्टी, दस्त, पेट में मरोड़ की शिकायत होने लगती है। गंभीर मामलों में मौत भी हो सकती है।ये लेख लेखक द्वारा किये गए मशरूम पर अध्ययन पर आधारित है।लेख में प्रयोग की गयी तस्वीरें गूगल से ली गयी हैं ।

Thursday, 27 July 2017

अगर मर्द करते है इन चीजों का सेवन तो हो सकते है नपुंसक

अगर मर्द करते है इन चीजों का सेवन तो हो सकते है नपुंसक 

दोस्तों आज मै आप को आज कुछ ऐसे फूड्स के बारे में बतायेगे जिन्हें खाने से मर्द नपुंसक हो सकते है ।ये ऐसी चीजे है जिन्हें या तो मर्द शौक में खाते है या फिर इनके लती बन जाते है ।ख़ास कर इन चीजों का गर्मियों में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ।ऐसे कई फूड्स होते हैं जो मर्दों की हेल्थ के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। इन फूड्स को ज्यादा खाने से कमजोरी के अलावा मोटापा, हार्ट प्रॉब्लम, किडनी प्रॉब्लम जैसी तकलीफ हो सकती है। आईये आपको बताते हैं ऐसे ही फूड्स के बारे में जिन्हें मर्दों को नहीं खाना चाहिए या कम खाना चाहिए।
सोया मिल्क और सोया प्रोडक्ट
रिफाइंड शुगर
ज़्यादा कॉफ़ी या कोल्ड ड्रिंन्क
टी ट्री आयल लेवेंडर आयल
मिंट
पैकेज्ड फूड
अल्कोहल
डेयरी प्रोडट्क्स
माइक्रोवेव पॉपकॉर्न
ऑयली और जंक फ़ूड
गुटखा
कृपया ध्यान रहे इन चीज़ों से अगर आप बच के रहेंगे तो आपकी सेहत में भी निखार आयेगा ।

Sunday, 23 July 2017

इस पौधे से आप जानकर भी है अन्जान इससे होते है हजारों फायदे


इस पौधे से आप जानकर भी है अन्जान इससे होते है हजारों फायदे 

लहसुन (Garlic) प्याज कुल (एलिएसी) की एक प्रजाति है। इसका वैज्ञानिक नाम एलियम सैटिवुम एल है। इसके करीबी रिश्तेदारो में प्याज, इस शलोट और हरा प्याज़ शामिल हैं। लहसुन पुरातन काल से दोनों, पाक और औषधीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसकी एक खास गंध होती है, तथा स्वाद तीखा होता है जो पकाने से काफी हद तक बदल कर मृदुल हो जाता है। लहसुन की एक गाँठ (बल्ब), जिसे आगे कई मांसल पुथी (लौंग या फाँक) में विभाजित किया जा सकता इसके पौधे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला भाग है। पुथी को बीज, उपभोग (कच्चे या पकाया) और औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियां, तना और फूलों का भी उपभोग किया जाता है आमतौर पर जब वो अपरिपक्व और नर्म होते हैं। इसका काग़ज़ी सुरक्षात्मक परत (छिलका) जो इसके विभिन्न भागों और गाँठ से जुडी़ जड़ों से जुडा़ रहता है, ही एकमात्र अखाद्य हिस्सा है। इसका इस्तेमाल गले तथा पेट सम्बन्धी बीमारियों में होता है। इसमें पाये जाने वाले सल्फर के यौगिक ही इसके तीखे स्वाद और गंध के लिए उत्तरदायी होते हैं। जैसे ऐलिसिन, ऐजोइन इत्यादि। लहसुन सर्वाधिक चीन में उत्पादित होता है उसके बाद भारत में।लहसुन में रासायनिक तौर पर गंधक की अधिकता होती है। इसे पीसने पर ऐलिसिन नामक यौगिक प्राप्त होता है जो प्रतिजैविक विशेषताओं से भरा होता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, एन्ज़ाइम तथा विटामिन बी, सैपोनिन, फ्लैवोनॉइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं।
लहसुन (Garlic) प्याज कुल (एलिएसी) की एक प्रजाति है। इसका वैज्ञानिक नाम एलियम सैटिवुम एल है। इसके करीबी रिश्तेदारो में प्याज, इस शलोट और हरा प्याज़ शामिल हैं। लहसुन पुरातन काल से दोनों, पाक और औषधीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसकी एक खास गंध होती है, तथा स्वाद तीखा होता है जो पकाने से काफी हद तक बदल कर मृदुल हो जाता है। लहसुन की एक गाँठ (बल्ब), जिसे आगे कई मांसल पुथी (लौंग या फाँक) में विभाजित किया जा सकता इसके पौधे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला भाग है। पुथी को बीज, उपभोग (कच्चे या पकाया) और औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियां, तना और फूलों का भी उपभोग किया जाता है आमतौर पर जब वो अपरिपक्व और नर्म होते हैं। इसका काग़ज़ी सुरक्षात्मक परत (छिलका) जो इसके विभिन्न भागों और गाँठ से जुडी़ जड़ों से जुडा़ रहता है, ही एकमात्र अखाद्य हिस्सा है। इसका इस्तेमाल गले तथा पेट सम्बन्धी बीमारियों में होता है। इसमें पाये जाने वाले सल्फर के यौगिक ही इसके तीखे स्वाद और गंध के लिए उत्तरदायी होते हैं। जैसे ऐलिसिन, ऐजोइन इत्यादि। लहसुन सर्वाधिक चीन में उत्पादित होता है उसके बाद भारत में।लहसुन में रासायनिक तौर पर गंधक की अधिकता होती है। इसे पीसने पर ऐलिसिन नामक यौगिक प्राप्त होता है जो प्रतिजैविक विशेषताओं से भरा होता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, एन्ज़ाइम तथा विटामिन बी, सैपोनिन, फ्लैवोनॉइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं।
यह लेख लहसुन के बिभिन्न पहलुओं के अध्ययन पर आधारित है। इस लेख में प्रयुक्त फोटो गूगल से ली गयी हैं। 

इस फल के बारे में जानकर आप रह जायेगे दंग जाने समस्त जानकारी


इस फल के बारे में जानकर आप रह जायेगे दंग जाने समस्त जानकारी 

कटहल या फनस का वृक्ष शाखायुक्त, सपुष्पक तथा बहुवर्षीय वृक्ष है। यह दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल-निवासी है। पेड़ पर होने वाले फलों में इसका फल विश्व में सबसे बड़ा होता है।[1] फल के बाहरी सतह पर छोटे-छोटे काँटे पाए जाते हैं। इस प्रकार के संग्रन्थित फल को सोरोसिस कहते हैं।

पत्ते

१० सेमी से लेकर २० सेमी लम्बे कुछ चौड़े ,किंचित अंडाकार और किंचित कालापनयुक्त हरे रंग के होते हैं।
पुष्प
कटहल में पुष्प स्तम्भ और मोटी शाखाओं पर लगते हैं। पुष्प ५ सेमी से लेकर १५ सेमी तक लम्बे , २-५ सेमी गोल अंडाकार और किंचित पीले रंग के होते हैं

फल

बहुत बड़े -बड़े लम्बाई युक्त गोल होते हैं। उसके उप्र कोमल कांटे होते हैं। भार में लगभग २० किलो वजन होता है।

कटहल के बीज के गुण 

बीज की मींगी वीर्यवर्धक ,वात ,पित्त तथा कफ नाशक होती है। मंदाग्नि रोग वालों को कटहल खाना छोड़ देना चाहिए।
ये लेख विभिन्न किताबों और पत्रिकाओं के अध्ययन पर आधारित है ,इस लेख में दी गयी जानकारी सही प्रकाशित करने की कोशिश की गयी है। समस्त फोटो गूगल से ली गयी हैं जिनका लेख की वास्तिविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।

धतूरे के इस पेड़ की वास्तविकता जान कर आप भी हो जायेगे हैरान एक बार जरूर पढ़ें

धतूरे के  इस पेड़ की वास्तविकता जान कर आप भी हो जायेगे हैरान एक बार जरूर पढ़ें 

दोस्तों आज मै आप को धतूरे के बारे में बताएँगे ,धतूरा एक जहरीला पौधा होते हुए भी इसका उपयोग हमारी जिन्दगी में बहुत महत्वपूर्ण है।धतूरा एक पादप है।। यह लगभग १ मीटर तक ऊँचा होता है। यह वृक्ष काला-सफेद दो रंग का होता है। और काले का फूल नीली चित्तियों वाला होता है। हिन्दू लोग धतूरे ले फल, फूल और पत्ते शंकरजी पर चढ़ाते हैं। आचार्य चरक ने इसे 'कनक' और सुश्रुत ने 'उन्मत्त' नाम से संबोधित किया है। आयुर्वेद के ग्रथों में इसे विष वर्ग में रखा गया है। अल्प मात्रा में इसके विभिन्न भागों के उपयोग से अनेक रोग ठीक हो जाते हैं।

आयुर्वेद में उपयोग

धतूरे के पत्तों का धूँआ दमा शांत करता है। तथा धतूरे के पत्तों का अर्क कान में डालने से आँख का दुखना बंद हो जाता है। धतूरे की जड सूंघे तो मृगीरोग शाँत हो जाता है। धतूरे की फल को बीच से तरास कर उसमें लौंग रखे फिर कपड मिट्टी कर भूमर में भूने जब भून जावे तब पीस कर उसका उडद बराबर गोलीयाँ बनाये सबेरे साँझ एक -एक गोली खाने से ताप और तिजारी रोग दूर हो जाय और वीर्य का बंधेज होवे। धतूरे के कोमल पत्तो पर तेल चुपडे और आग पर सेंक कर बालक के पेट पर बाँधे इससे बाल का सर्दी दूर हो जाती है। और फोडा पर बाँधने से फोडा अच्छा हो जाता है। बवासीर और भगन्दर पर धतूरे के पत्ते सेंक कर बाँधे स्त्री के प्रसूती रोग अथवा गठिया रोग होने से धतूरे के बीजों तेल मला जाता है।
ये लेख विभिन्न किताबों और पत्रिकाओं के अध्ययन पर आधारित है ,इस लेख में दी गयी जानकारी सही प्रकाशित करने की कोशिश की गयी है। समस्त फोटो गूगल से ली गयी हैं जिनका लेख की वास्तिविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

Thursday, 20 July 2017

हैरत में डालने वाला बथुआ का पेड़ पढ़ें पूरा रहष्य


नमस्कार दोस्तों ,आज मै आप लोगों को हेल्प इंडिया के माध्यम से एक ऐसी खबर बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर आप भी थोडा हैरान हो सकते है।

 मैंने जो अपनी आँखों से देखा उसके बारे में बताऊंगा। आपने बथुआ का तो सेवन जरूर किया होगा इसका वानस्पतिक नाम चेनोपोडियम अल्बम है।

इसकी अधिकतम लम्बाई पांच से वीस सेमी तक होती है। ये छोटा-सा दिखने वाला हराभरा पौधा काफी फायदेमंद है, सर्दियों में इसका सेवन कई बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है।

 बथुए में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, बथुआ न सिर्फ पाचनशक्ति बढ़ाता बल्कि अन्य कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाता है।बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है।

बैसे तो ये रवी सीजन का एक खरपतवार है ,मगर इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के भोजन में प्रयोग जिया जाता है। मगर आज मै जिस बथुआ के पेड़ की बात कर रहा हूँ ,वो है ही अजीव  इसकी लम्बी लगभग 15 से 20 फिट है। ये बथुआ का पेड़ जनपद हरदोई से लगभग 7 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम भिठारी के मजरा बगहा में है। पहले नज़र में तो मैंने भी इसे देख कर विशवास नहीं किया ,मगर जब मैंने वास्तविक रूप से निरीक्षण किया तो मैंने पाया कि ये तो वास्तव में बथुआ का ही पेड़ है।

 ये पौधा दो वर्ष पहले सत्यपाल पुत्र मैकू ने अपने  घर के पास लगाया था। सत्यपाल ने बातचीत में बताया कि इसका प्रयोग तमाम औषधियों में किया जाता है ,और सर्दियों के अलाबा इसे अन्य सीजन में ढूँढना नामुमकिन है ,इसी कारण इसे इतना बड़ा किया गया है ,और इसकी उपलब्धता हर समय रहती है। गांव वालों ने ये भी बताया कि इस बथुआ के पेड़ को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं। 

ऐसे बैक्टीरिया जिनका हमारे जीवन में न होने से हो सकता है बड़ा नुकसान आईये जाने विस्तार से


ऐसे बैक्टीरिया जिनका हमारे जीवन में न होने से हो सकता है बड़ा नुकसान आईये जाने विस्तार से

औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव
उद्योगों में भी सूक्ष्मजीवों का प्रयोग बहुत से उत्पादों के संश्लेषण में किया जाता है जो मनुष्य के लिए काफी मूल्यवान होते हैं। मादक पेय तथा प्रतिजैविक (ऐंटीबॉयटिक) इसके कुछ उदाहरण हैं। व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे 'फरमैंटर' या 'किण्वक' कहते हैं।
किण्वित पेय
सूक्ष्मजीव (विशेषकर यीस्ट) का प्रयोग प्राचीन काल से वाइन, बियर, ह्निस्की, ब्रांडी या रम जैसे पेयों के उत्पादन में किया जाता आ रहा है। वही यीस्ट सैकेरोमाइसीज सैरीबिसी (जो सामान्यतः 'ब्रीवर्स यीस्ट' के नाम से भी प्रसिद्ध है) ब्रैड बनाने तथा माल्टीकृत धान्यों तथा फलों के रसों में ऐथानॉल उत्पन्न करने में प्रयोग किया जाता है। किण्वन तथा विभिन्न प्रकार के संसाधन (आसवन आदि) कच्चे पदार्थों पर निर्भर करती है : वाइन तथा बियर का उत्पादन बिना आसवन के किया जाता है जबकि ह्निस्की, ब्रांडी तथा रम किण्वित रस के आसवन द्वारा तैयार किए जाते हैं।
प्रतिजैविक (ऐंटीबॉयोटिक)
सूक्ष्मजीवों द्वारा प्रतिजैविकों (ऐंटीबॉयोटिकों) का उत्पादन 20वीं शताब्दी की अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण खोज और मानव समाज के कल्याण के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। प्रतिजैविक (ऐंटीबॉयोटिक) एक प्रकार के रसायनिक पदार्थ हैं, जिनका निर्माण कुछ सूक्ष्मजीवियों द्वारा होता है। यह अन्य (रोग उत्पन्न करने वाले) सूक्ष्मजीवियों की वृद्धि को मंद कर सकते हैं अथवा उन्हें मार सकते हैं। पैनीसीलिन सबसे पहला ऐंटीबॉयोटिक था। इस ऐंटीबॉयोटिक का प्रयोग दूसरे विश्व युद्ध में घायल अमरीकन सिपाहियों के उपचार में व्यापक रूप से किया गया।
पैनीसिलिन के बाद अन्य सूक्ष्मजीवियों से अन्य ऐंटीबॉयोटिकों को बनाया गया। प्लेग, काली खाँसी, डिप्थीरिया (गलघोंटू), कुष्ठरोग जैसे भयानक रोग, जिनसे संसार में लाखों लोग मरे हैं, के उपचार के लिए ऐंटीबॉयोटिकों ने हमारी क्षमता में वृद्धि की एक शक्ति के रूप में आये हैं। आज हम ऐंटीबॉयोटिकों से रहित संसार की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं।
रसायन, एंजाइम तथा अन्य जैवसक्रिय अणु

कार्बनिक अम्ल, ऐल्कोहल तथा एंजाइम आदि कुछ विशेष प्रकार के रसायनों के व्यावसायिक तथा औद्योगिक उत्पादन में सूक्ष्मजीवों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
अम्लीय उत्पादकों के उदाहरण
सिट्रिक अम्ल का ऐस्परजिलस नाइगर (एक कवक),
एसीटिक अम्ल का एसीटोबैक्टर एसिटाई (जीवाणु)
ब्युट्रिक अम्ल का क्लोस्ट्रीडियम ब्यूटायलिकम (एक जीवाणु) तथा
लेक्टिक अम्ल का लैक्टोबैसिलस
ऐथानॉल के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए यीस्ट (सैकेरोमाइसीज सैरीविसेएई) का प्रयोग किया जाता है। लाइपेज का प्रयोग धुलाई में कपड़ों से तेल के धब्बे हटाने में किया जाने लगा है। हम बाजार से खरीद कर फल-रस की जो बोतल लाते हैं उसका रस घर में बने रस की तुलना में अधिक साफ दिखाई पड़ता है। पैक्टीनेजिज तथा प्रोटीऐजिज के प्रयोग के कारण बोतल वाला रस अधिक स्वच्छ एवं साफ होता है। स्ट्रैप्टोकाइनेज स्ट्रैप्टोकोकस जीवाणु (बैक्टीरियम) द्वारा उत्पन्न होता है जो आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा रूपांतरित किया जाता है। इसका प्रयोग रोगियों के रक्त वाहिकाओं से थक्का (क्लॉट) हटाने (‘थक्का स्फोटन’) के लिये किया जाता है।

अन्य जैव सक्रिय अणु ‘साइक्लोस्पोरिन-ए’ है। जिसका प्रयोग अंग प्रतिरोपण में प्रतिरक्षा निरोधक (इम्युनोसप्रेसिव) कारक के रूप में रोगियों में किया जाता है। इसका उत्पादन ट्राइकोडर्मा पॉलोस्पोरमनामक कवक से किया जाता है। मोनॉस्कस परप्यूरीअस यीस्ट से उत्पन्न इस स्टैटिन का व्यापारिक स्तर पर प्रयोग रक्त-कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाले कारक के रूप में किया जाता है। कोलेस्ट्रॉल के संश्लेषण के लिए उत्तरदायी एंजाइम स्पर्धा संदमन (निरोधण) की तरह क्रिया करते हैं।
जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव

आज पर्यावरण प्रदूषण चिंता का एक मुख्य कारण है। कृषि उत्पादों की बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिए रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग इस प्रदूषण का प्रमुख कारण है। लोग अब समझने लगे हैं कि रसायनिक उर्वरकों के अधिकाधिक प्रयोग से कई समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप जैविक खेती करने पर तथा जैव उर्वरकों के प्रयोग पर बल दिया जा रहा है। हाल ही में, भारत में जैव उर्वरकों की एक बड़ी संख्या बड़े पैमाने पर बाजार में उपलब्ध होने लगी है। किसान अपने खेतों में लगातार इनका प्रयोग कर रहे हैं। इससे मृदा पोषक की भरपाई तथा रसायन उर्वरकों पर आश्रिता भी कम हो रही है।
जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव हैं जो मृदा की पोषक गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। इनकाजै मुख्य स्रोत जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया होते हैं। द्विदालीय (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी संबंध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते हैं। अन्य जीवाणु (उदाहरण ऐजोस्पाइरिलम तथा ऐजोबैक्टर) मृदा में मुक्तावस्था में रहते हैं। यह भी वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर सकते हैं। इस प्रकार मृदा में नाइट्रोजन अवयव बढ़ जाते हैं।
कवक पादपों के साथ सहजीवी संबंध (माइकोराइजा) स्थापित करते हैं। ग्लोमस जीनस के बहुत से सदस्य माइकोराइजा बनाते हैं। इस संयोजन में कवकीय सहजीवी मृदा से फास्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों में भेज देते हैं। ऐसे संबंधों से युक्त पादप कई अन्य लाभ जैसे मूलवातोढ़ रोगजनक के प्रति प्रतिरोधकता, लवणता तथा सूखे के प्रति सहनशीलता तथा कुलवृद्धि तथा विकास प्रदर्शित करते हैं।

सायनोबैक्टीरिया स्वपोषित सूक्ष्मजीव हैं जो जलीय तथा स्थलीय वायुमंडल में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं। इनमें बहुत से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर सकते हैं, जैसे- ऐनाबीना, नॉसटॉक, ऑसिलेटोरिया आदि। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं। नील हरित शैवाल भी मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ा देते हैं जिससे उसकी उर्वरता बढ़ जाती है।
ये लेख मेरे द्वारा किये गए बिभिन्न किताबों और पत्रिकाओ के अध्ययन पर आधारित है ,ये लेख लेखक के अपने स्वंम के विचारों पर आधारित है .फोटो का सोर्स गूगल इमेज है ,जिनका इस लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है ,

Friday, 9 June 2017

गर्मियों में नींबू पानी पीने के स्वास्थ्य लाभ


गर्मियों में नींबू पानी पीने के स्वास्थ्य लाभ



गर्मियों में नींबू आसानी से किफायती दामों में उपलब्ध होता है। यह एक अम्लीय फल (acidic fruit) तथा स्वाद में वृद्धि करने वाला तत्व भी है। इसका प्रयोग कई खाद्य पदार्थों जैसे सलाद, चिकन तथा पेय पदार्थों का स्वाद बढाने के लिए किया जाता है। नींबू के फायदे, नींबू का सबसे आम प्रयोग नींबू पानी बनाने में किया जाता है। इसके लिए सिर्फ एक नींबू को एक इलास में निचोड़कर इसे पीना होता है। नींबू के फायदे, आप अपनी इच्छानुसार इसमें चीनी या नमक मिलाकर इसके स्वाद में इजाफा कर सकते हैं। खाली पेट में नींबू पानी को गर्म पानी के साथ मिलाकर पीने से वज़न कम होता है,हाजमे की समस्या से छुटकारा मिलता है तथा प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होती है।
गर्मियों का दिन ज़्यादातर लोगों के लिए छुट्टियों का दिन भी होता है। वे इस समय घूमना फिरना तथा अपने परिवार के साथ समय बिताना पसंद करते हैं। परन्तु इसी समय वे सूरज की हानिकारक किरणों के संपर्क में भी आते हैं। नींबू के लाभ, नींबू पानी खासकर गर्मियों में पैदा होने वाली समस्याओं जैसे मतली, सीने में जलन तथा शरीर में पानी की कमी को दूर करने में काफी कारगर सिद्ध होता है। जो लोग उच्च तापमान में बाहर काम करते हैं, वे सनस्ट्रोक (sunstroke), मतली और डिहाइड्रेशन (dehydration) का काफी शिकार होते हैं। नींबू पानी इन सब परेशानियों का इलाज अपने में समेटे हुए है।
नींबू के लाभ, नींबू पानी का स्वाद बढाता है तथा गर्मियों में आपके शरीर में पानी की मात्रा में इजाफा करता है, क्योंकि इस मौसम में हाइड्रेटेड (hydrated) रहना काफी आवश्यक है। अतिरिक्त पसीना निकलने की वजह से ना सिर्फ आपके शरीर में पानी की कमी होती है, बल्कि चीनी और ग्लूकोस (glucose) का स्तर भी आपके शरीर से कम हो जाता है। नींबू के फायदे, नींबू पानी में नमक और चीनी मिलाने से इस समस्या से आपको छुटकारा मिल सकता है। नींबू के लाभ, यह दस्त और हाजमे की समस्या को दूर करने में भी काफी कारगर सिद्ध होता है, जो कि तापमान बढ़ने की वजह से काफी आम हो जाते हैं। यह पेट की अन्य समस्याओं जैसे सूजन, कब्ज़, गैस (gas) तथा सीने में जलन का भी अच्छे से इलाज करता है।
नींबू के फायदे, नींबू पानी एक बेहतरीन एंटी ऑक्सीडेंट (antioxidant) तथा विटामिन सी (vitamin c) का बेहतरीन स्त्रोत होता है। इसमें कई प्रकार के खनिज जैसे पोटैशियम, मैग्नीशियम तथा फॉस्फोरस (potassium, magnesium and phosphorus) भी मौजूद होते हैं। नींबू के फायदे, नींबू पानी का सेवन रोज़ाना करने से आपके मेटाबोलिज्म (metabolism) में वृद्धि होती है और इससे आपके पाचन अंगों को पेट से गन्दगी और अन्य टोक्सिन्स (toxins) निकालने में सहायता मिलती है। यह कब्ज़ और पैरासाइट (parasites) की समस्या का काफी प्रभावी इलाज है, खासकर बच्चों के लिए यह काफी उपकारी सिद्ध होता है क्योंकि यह उनके पेट पर काफी हल्का होता है। यह लिवर (liver) की अधिक बाइल (bile) उत्पादन करने में मदद करता है और इस तरह आपके हाजमे की प्रक्रिया को और सुचारू बनाता है। जैसा कि डॉक्टर कहते हैं कि हर समस्या की जड़ पेट से ही शुरू होती है, और नींबू पेट से जुड़ी हर एक बीमारी का कारगर उपाय सिद्ध होता है।
नींबू के गुण, नींबू पानी आपकी प्रतिरोधक क्षमता तथा रोगों से लड़ने की आपकी शक्ति में काफी वृद्धि करता है। क्योंकि यह विटामिन सी का एक बेहतरीन स्त्रोत होता है, अतः यह आपकी एक हद तक फ्लू वायरस (flu virus) से निपटने में काफी मदद करता है। नींबू के गुण, नींबू पानी आपके शरीर से और भी ज़्यादा पसीना निकालने में मदद करता है जो गर्मियों के मौसम में काफी उपकारी सिद्ध होता है। यह आपकी त्वचा को साफ़ और स्वस्थ बनाता है। यह शरीर से विषैले पदार्थों को दूर हटाने में सहायता करता है तथा आपको काफी निखरी और जवान त्वचा प्रदान करता है। नींबू के गुण, यह रक्त को साफ करने में भी महारत रखता है और इस तरह प्राकृतिक रूप से आपकी त्वचा की खूबसूरती को बढाता है। यह काफी बेहतरीन एंटी एजिंग (anti ageing) पेय पदार्थ है और आपकी त्वचा से सनटैन (sun tan) प्रभावी रूप से हटाता है। नींबू का रस आपके बालों के लिए भी काफी अच्छा होता है। नींबू के गुण, बालों को धोने के बाद सिर्फ नींबू पानी का प्रयोग इनपर कंडीशनर (conditioner) की तरह करें। इससे बालों को चमक मिलेगी। नींबू का प्रयोग सीधे अपने सिर की त्वचा पर करने से डैन्ड्रफ (dandruff) से भी छुटकारा मिलता है।

Friday, 12 May 2017

हृदय एवं हृदय-संबंधी रोगों का आयुर्वेदिक/घरेलू उपचार



फोटो स्रोत -NutriWorld

हृदय एवं हृदय-संबंधी  रोगों का आयुर्वेदिक/घरेलू  उपचार



हृदयरोग आज के युग में मृत्यु का प्रमुख कारण है. पहले यह समस्या समृद्ध देशों में अधिक पाई जाती थी परंतु अब इसका प्रकोप प्रगतिशील देशों में भी देखने को मिलता है. उच्च रक्तचाप , मधुमेह, परिवारिक आनुवांशिक कारण, धूम्रपान, ये सब इस रोग की संभावना को बढ़ा देते हैं. व्यक्ति की जीवन शैली तथा आम जीवन उसका व्यवहार भी इन रोगों के होने की संभावना को निर्धारित करते हैं.

हृदयरोग के कारण (Causes of Heart And Cardiovascular Diseases In Hindi)


हृदयरोग होने का प्रमुख कारण है खान-पान संबंधी ग़लत आदतें, अधिक समय बैठे रहना, व्यायाम या शारीरिक परिश्रम ना करना, अधिक चिंता करना, समय पर ना सोना इत्यादि.
नवीनतमशोथ के अनुसार, फसलों में प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक, केमिकल खाद, चीनी से लैस भोजन, फास्ट फुड, तनावग्रस्त जीवन जीने से सर्वाधिक रूप से हो रहे हैं. अब मॉडर्न मेडिसिन (modern medicine) के विशेषज्ञ भी यह समझते हैं की आयुर्वेद द्वारा हृदय रोगों को जड़ से मिटाया जा सकता है.
अनियमित एवं गरिष्ठ, तले, अत्यधिक चीनी-युक्त भोजन का नियमित सेवन करने से और लगातार बैठे रहकर काम करने से हृदय रोग की उत्पत्ति होती है.
यदि पाचन क्रिया ठीक ना हो तो यह हृदय रोगों की उत्पत्ति का कारक बन जाती है. जो खाना शरीर में ठीक से नही पचता, उससे आम (acidic toxins) की उत्पत्ति होती है. यह आम रक्त में जस्ब होकर ‘साम’ का निर्माण करता है. यह पदार्थ रक्त को सामान्य से गाढ़ा बना देता है जिससे धमनियों के स्रोतों में ‘आम’ जम जाता है, ख़ासकर उन हिस्सों में जहा पहले से कोई कमज़ोरी हो.

इस तरह रक्त धमनियों की व्यास कम हो जाता है और परिणाम स्वरूप रक्त के वहन से सामान्य से अधिक दबाव का निर्माण हो जाता है. यह बढ़ा हुआ दबाव ही उच्च रक्तचाप का रूप लेता है. इससे रक्त धमनियाँ अधिक मोटी और सख़्त हो जाती है इस रोग को अंजीयोसक्लेरोसिस (angiosclerosis) कहा जाता है.  यदि रक्तचाप बढ़ा हुआ ही रहे तो रक्त में मौजूद आम और कोलेस्टरॉल धमनियों की दीवारों पर जमा होते रहतें हैं. इससे धमनियाँ और संकरी हो जाती हैं, भोजन में अधिक चीनी से रक्त वाहिनी की आंतरिक परत पर इनफ्लमेशन (जलन) होती  है जिससे वहाँ पर रक्त में मौजूद एल डी एल जम जाता है और खुरदरी परत का निर्माण कर देता है. इससे (धमनी में) रक्त का थपका (clot) बन जाता है.  यह थपका रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न करता है. परिणामस्वरूप यह जिस हिस्से में होता है वहाँ  रक्त के वहन में अवरोध होता है. यदि ऐसा हृदय की धमनी में हो, तो हार्ट अटॅक हो जाता है. इसी प्रकार अगर यह दिमाग़ की नसों में हो, तो ब्रेन स्ट्रोक हो जाता है. गौरतलब है यह इनफ्लमेशन मैदे से बनी चीज़ों का अधिक सेवन करने से और वेजिटेबल आयिल (vegetable oil) में पके भोजन से भी उत्पन्न होती है.

आयुर्वेद द्वारा हृदय- संबंधी रोगों की चिकित्सा (Treatment Of Heart Or Cardiovascular Diseases In Ayurveda- Hindi)


मॉडर्न मेडिकल साइंस के अनुसार हृदय रोग जैसी व्याधियाँ क्रॉनिक डिसीज़स (chronic diseases) के क्षेत्र में आती हैं जिन्हे सिर्फ़ नियंत्रण में रखा जा सकता है. लगभग ३ दशक पहले इन रोगों को अपराजेय (untreatable) माना जाता था. परंतु आयुर्वेद के अनुसार यदि कुशलता पूर्वक इनका इलाज किया जाए तो ये रोग ठीक हो सकते हैं. रोगी के आत्मविश्वास और स्वयं के स्वास्थ के प्रति निष्ठा पर भी निर्भर करता है कि वह रोग से कितनी रोग शीघ्र मुक्त हो जाता है. कुछ साधारण प्रयोगों द्वारा हृदय के स्वस्थ को बढ़ाया जा सकता है. ना सिर्फ़ इनके द्वारा रोग को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है अपितु यह पाया गया है की रोग जड़ से समाप्त हो जाता है, धमनी में उत्पन्न अवरोध पूरी तरह से खुल जाते हैं और व्यक्ति एक स्वस्थ जीवन जी सकता है.
त्रिफला गुग्गूल के उपयोग द्वारा रक्त-वहिनियों में जमा हुआ आम और वसा बाहर आ जाते हैं और स्रोतों को पोषण भी प्राप्त होता है.
अमला का नित्य प्रयोग करने से रक्त में antioxidants की मात्रा बढ़ती है जिससे धमनियों की free-radicals से सुरक्षा होती है. अमला हृदय तथा धमनियों का उचित पोषण कर उन्हें मजबूत बनता हैं. अमला का उपयोग च्याव्ानप्राश नामक रसायन मे प्राचुर्य में किया गया है. यह फल हृदय में अवरोध को घटाकर रक्त के दौरे को बढ़ाने में मदद देता है.

अर्जुन की छाल जिससे congestive heart failure नामक रोग को होने से रोका जा  सकता यह औषधि हृदय को मज़बूत भी बनाती है.
अश्वगंधा से मानसिक तनाव दूर करने में उपयोगी है और इसके सेवन से तनावजन्य उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है.

पथ्य और अपथ्य (Dietary Tips Useful In Heart And Cardiovascular Diseases-Hindi)


पोशक तत्वों से भरपूर भोजन लेना बहुत ज़रूरी है.
रेफाइंड तेल (refined oils), LDL युक्त वेजिटेबल तेल (vegetable oils) का प्रयोग नही करना चाहिए. वेजिटेबल आयिल्स में पाए जाने वाले लिपिड्स (lipids) हृदय के स्वास्थ के लिए हानिकारक हैं.
आपको जानकार शायद हैरानी हो की प्राकृतिक मक्खन या गाय के दूध से बने घी के सेवन से रक्त धमनियों को रक्षक परत मिलती है जिससे रक्त में मौजूद शुगर से इनमें (धमनियों) इनफ्लमेशन (inflammation) नहीं होती. (विचार-योग्य है कि इनफ्लमेशन के कारण ही रक्त का थपका धमनी में निर्मित होता ही जिससे रक्त के दौरे में अवरोध पैदा होता है). ये EFA (essential fatty acids)  और HDL का स्रोत भी हैं.
साबुत या छिलके वाली दालें, साबुत अनाज तथा ताज़ा फल, सब्जियाँ और HDL, EFA (essential fatty acids) युक्त भोजन को लेना हृदय के स्वास्थ के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
सुबह का नाश्ता तथा रात्रि का भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए. दोपहर के भोजन थोड़ा गरिष्ठ हो सकता है.
दूध से बने पदार्थ, तथा ठंडा बासी भोजन नही लेना चहिये.
मैदा तथा उससे बने सभी पदार्थ अपथ्यकर हैं (नहीं खाने योग्य).
माँस, शराब तथा धूम्रपान के सेवन से रक्त में अम्लता (acidity) बढ़ती है और जीव विष (toxins) उत्पन्न होते हैं जिससे हृदयरोगी को बचना चाहिए.
अंकुरित अन्न, कॉटेज चीज़, गाय के दूध से बना देसी घी, ताज़ा दूध, हृदय रोगी के लिए पथ्यकर हैं (खाने योग्य).
बहुत अधिक खाने से बचना चाहिए तथा भूख लगने पर ही आवश्यकता अनुसार भोजन करें. पेट भरकर खाना स्वस्थ के लिए हानिकारक है अतः भूख से कुछ कम ही खाना चाहिए. इससे हृदय-संबंधी रोगों में और उच्च रक्तचाप में आराम मिलता है.


आयुर्वेद में निहित हृदय-रोग संबंधी औषधीय प्रयोग (Some Home Remedies Useful In Heart Or Cadiovascular Diseases -Hindi)


रसोना या लहसुन के सेवन से उच्च रक्तचाप के नियंत्रण मेी साहयता मिलती है. लस्सी में 1 ग्राम लहसुन का पेस्ट डालकर दिन में 2 बार पीना चाहिए. लहसुन का तत्व बढ़े हुए कोलेस्टरॉल को नियंत्रित करता है.
मेथी दाना का एक चम्मच रात को सोने से पूर्व भिगो दें. प्रातः काल में खाली पेट इस मेथी दाना को चबाकर खाना चाहिए.
त्रिफला चूर्ण सुबह शहद के साथ लेने से भी रक्त की शुद्धि और उच्च रक्तचाप से मुक्ति मिलती है.
अर्जुन की छाल के प्रयोग से भी हृदय रोग में लाभ मिलता है. और रक्त के दौरे को अवरोध मुक्त होने में सहायता मिलती है. अर्जुन हृदय को पुष्ट करने में भी सहायता देती है. 30 ग्राम अर्जुन की छाल और 15 ग्राम गेहूँ के आटे को गाय के दूध से बने देसी घी में भुन लें. इसमें थोड़ा सा गाय का दूध मिलायें और इस मिश्रण को थोड़ी देर पकाएँ और फिर इस में पानी डाल दें. इस हलवे के सेवन से हृदय रोगों में लाभ मिलता है.

त्रिफला गुग्गूल के सेवन से धमनियों में जमा आम और लिपिड्स को निकाला जा सकता है.
एक कप दूध के साथ 1 ग्राम अर्जुन की छाल का सेवन दिन में एक बार करें.
गुलकंद का सेवन से भी हृदय को पुष्ट करने के साथ-साथ बढ़ी हुई धड़कन को नियंत्रित रखने में साहायता करता है.
शहद के नित्य सेवन से भी हृदय को पोषण प्राप्त होता है.
अनार के रस को रोज़ पीने से दिल की बीमारियों से निजात मिलती है. अनार के सूखे हुए पत्तों का चूर्ण बनाकर ताजे पानी के साथ सेवन करना चाहिए. इस प्रयोग से धमनियों में जमा मल सुरक्षित रूप से शरीर से निकल जाता है.
जहारमोरहा भी हृदयरोग में उपयोगी औषधि है. गुलाब जल से सिद्ध किया हुया जहारमोहरा का चूर्ण हृदय रोग में बहुत फ़ायदेमंद है. शिलाजीत या राक सॉल्ट के नियमित सेवन से भी इन रोगों में लाभ मिलता है.
कुशल आयुर्वेदचार्य से सलाह लेकर इनमें से कोई भी प्रयोग नियम से करें तो आपको जल्दी ही स्वास्थलाभ मिल जाएगा.


हृदय रोग से बचाव (Prevention Of Heart Or Cardiovascular Diseases in Hindi)


शाकाहारी भोजन का सेवन और माँस, मदिरा तथा धूम्रपान निषेध से हृदय रोग की संभावना बहुत कम हो जाती है.
चाय, कॉफी तथा कॅफीन युक्त पेय अधिक मात्रा में नहीं लेने चाहिए.
नियमित व्यायाम, फुर्तीली सैर (brisk walking), जॉगिंग, तैराकी से भी हृदय रोग की संभावना कमतर होती है.
योगासनों का नित्य अभ्यास हृदय और तंत्रिका तंत्र दोनों को स्फूर्तिवान और मज़बूत बनाता है. योगासन के बाद नाड़ी शोधन प्राणायाम का रोज़ अभ्यास किया जाए तो मानसिक, अध्यात्मिक और शारीरिक स्वास्थ में चमत्कारिक लाभ मिलता है. विपरीतकरणी, सर्वंगासन, अधोमुखशवानासान, पश्चिमोत्तनासन तथा अन्य आसनों का अभ्यास किसी योग्य आचार्य से सीख कर करना चाहिए. आसनों के क्रम के अंत में शवासन द्वारा खुद को विश्रान्ति देना न भूलें. 

सावधानी:

 योगासन कुशल योगचार्य से सीख कर अथवा उनके दिशानिर्देश में ही करें. किताब या अन्य सोशियल मीडीया को देखकर आसान अभ्यास नही करना चाहिए.
इसके अलावा व्यवहार में सरलता, प्रेम, मधुरता लाने से शरीर के लिए भी बहुत सुखदायक है. इससे हम व्यर्थ झगड़ों से बचते है और आंतरिक बल का सृजन भी होता है.
मस्तिष्क को शांत रखने से उच्च रक्तचाप बढ़ने से बचता है. यदि अधिक क्रोध आता हो तो स्वासों पर ध्यान केंद्रित करने से इस व्यावहारिक कष्ट से निवृत्ति मिलती है. व्यवहार को सौम्या बनाने की चेष्टा करें. खुल के हसना हृदय के लिए अच्छा है. यदि रोना भी आए तो खुल के रो लें और मानसिक  वेगो से स्वयं को मुक्त रखिएं, उन्हे दबाएँ नहीं.
त्रिफला का सेवन शहद के साथ प्रातः काल उठकर करने से रक्त में मौजूद आम से निवृत्ति प्राप्त होती है और हृदय को पोषण भी मिलता है.
ताज़ा आँवला से निकले हुए रस का सेवन रोज़ करने से हृदय को पुष्टि और स्वास्थ में वृद्धि होती है.

स्रोत और उद्धरण-http://ayurvedahindi.in/heart-cardiovadiseases-treatment.html

Wednesday, 10 May 2017

अच्छी सेहत कैसे बनाये,आसन से टिप्स


अच्छी सेहत कैसे बनाये,आसन से टिप्स 


अच्छी सेहत कैसे बनाये: ये सवाल अक्सर आपके मन में जरूर आता होगा क्योंकि आज कल हर कोई अच्छा दिखना चाहता है और ये सरल सी ही बात है अच्छा दिखने के लिए सेहत अच्छी होना जरुरी है| तो आज हम यहां कुछ सरल सी टिप्स देने जा रहे जिनके जरिये आप 10 दिन में ही अपने अंदर फ्रर्क महसूस करेंगे| तो चलते हैं उन तरीको की और जिसमे हम आपको शरीर बनाने के टिप्स  देंगे जो आपकी सेहत के लिए बहुत ही जरूरी है और जिससे आप हेल्थी और फिट रहेंगे|

अच्छी सेहत कैसे बनाये ? 


इन सेहत बनाने के घरेलू उपाय, सेहत के घरेलू नुस्खे  को आजमाने से आप अपने अंदर कुछ ही दिन में फ्रर्क महसूस करेंगे| इन् तरीको को आजमाए और अपनी अच्छी सेहत कैसे बनाये जैसे सवालो से छुटकारा पाए|

  शरीर बनाने के टिप्स : सेहत बनाने का पहला मंत्र


जल्दी सोना और जल्दी सुबह उठना|

जल्दी सोना और जल्दी उठना : ये सेहत बनाने का सबसे बड़ा मंत्र  अगर आप सच में सेहत बनाना छठा है तो सबसे पहले आपको रोजाना टाइम से सोना होगा और जल्दी टाइम से उठना होगा| वैसे अगर आपको रिलैक्स करना है तो आप योग कैसे करे भी सीख सकते हैं|
सुबह जल्दी उठना: आपको सुबह रोज जल्दी पांच बजे उठना होगा और वर्जिस पर जाना होगा| सुबह जल्दी उठके आप आप दौड़ पर भी जा सकते हो सुबह की एक्सरसाइज सेहत बनाने के लिए सबसे जरूरी होती है | सुबह की दौड़ से बहोत से फायदे होते है इससे आपके फेफड़ो में जान आयगी और ये स्वस्थ बने रहेंगे, दौड़ लगाने से आपकी सुंदरता भी भड़ती है और सरीर आकड़ा भी अच्छा हो जाता है जिससे आपकी  पर्सनालिटी भी भड़ती है| और लोग आपको देख के आकर्षि भी होंगे| आप प्रातः काल में बाबा रामदेव योग भी कर सकते हैं |

बॉडी बनाने के उपाय: सेहत बनाने के लिए अच्छा आहार


सेहत बनाने का दूसरा मंत्र : नाश्ता करो राजकुमार की तरह, दिन खाना खाओ राजा की तरह और रात खाना खाओ भिखारी की तरह|

सुबह का नास्ता: सेहत बनाने के लिए सुबह का नास्ता में अच्छा आहार भी बहुत जरुरी होता है| सुबह की एक्सरसाइज के बाद आप आठ दस बादाम ले और दूध जरूर ले इस बात का ध्यान जरूर रखे की दूध के संग कुछ न कुछ जरूर ले जैसे आप दूध के संग रोटी भी ले सकते है| इससे आपके सरीर ताकत मिलेगी जिससे आपके सरीर में कमजोरी नही आयगी|
दिन का खाना : दिन का खाना आप जितना भारी कर सकते है उतना ले क्यों की दिन का खाना हमारे सरीर के लिए बहुत जरूरी होता है| दिन के खाने में आप नॉन-वेज भी ले सकते है और अगर आप वेजेटेरियन है तो आप अपने दिन खाने में पनीर और दाल जरूर ले और उसके साथ सल्लाद भी ले|
रात का खाना: आप रात का खाना जितना हल्का ले उतना ही अच्छा होता है| अगर हम रात को ज्यादा भारी खाना खाते है तो हमारा शरीर उसे पचा नही पाता और उस कारण हमारा सुबह का नास्ता और दिन के खाने में फ्रर्क आजाता है| जो की सेहत बिगाड़ ने के लिए काफी है|रात का आहार उतना ही ले जितने में आपकी भूक ख़तम हो जाए|
इस बात का भी जरूर ध्यान रखे की आप हरी सब्जी जरूर खाये चाहे आप नॉन-वेजेटेरियन है या फिर वेजेटेरियन अपने दिन के और रात के खाने में एक हरी सब्जी जरूर खाये बाकि सब्जियों के साथ|

Tuesday, 9 May 2017

इलाहाबाद: स्किन स्पेशलिस्ट के टिप्स- गर्मी में कैसे रखें त्वचा का ख्याल


इलाहाबाद: स्किन स्पेशलिस्ट के टिप्स- गर्मी में कैसे रखें त्वचा का ख्याल


 गर्मियों का मौसम आते ही तापमान का पारा शहर दर शहर बढ़ने लग है। इन दिनों उत्तर भारत के कई इलाकों में गर्मी का प्रकोप देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत उत्तर भारत के साथ देश के पश्चिमी राज्यों में गर्मी के कारण लोगों का बुरा हाल है।

इलाहाबाद में भी इन दिनों रिकॉडतोड़ गर्मी पड़ रही हैं। यहां तापमान 42 से लेकर 45 डिग्री तक पहुंच जाती है। इतनी गर्मी में अपने सेहत का ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है। इसी को देखते हुए NYOOOZ ने स्किन स्पेशलिस्ट डॉक्टर अंतिम दास से बातचीत की, जिन्होंने गर्मी से बचने के लिए कुछ सझाव दिए, जो निम्नलिखित है...

1. सबसे महत्वपूर्ण है कि ठंडी जगह में रहे, अगर बाहर निकलना ही पड़े तो ठंडा पानी, लाइम वॉटर, नारियल पानी  काफी मदद करता है।

2. पतली लाइट कलर की शर्ट पहने, संस क्रीम का प्रयोग करें, ठंडी जगह पर रहें, ज्यादा भागना दौड़ना न करें नहीं तो हीट इंटोलरेंस हो जाती है।

3. बॉडी टेंपरेचर की कोशिश करना चाहिए ज्यादा से ज्यादा नीचे रहे क्योंकि बढ़ने से हीट स्ट्रोक हो सकता है, आदमीं अपनी चेतना खो सकता है, उलटी हो सकती है, डायरिया हो सकता है।

4. गर्मी के कारण खून की जो नसे है उनमें खून ज्यादा चला जाता है और बॉडी के जो आर्गन है उनका खून भी बाहर की तरफ जला जाता है क्योंकि बॉडी हीट को डस्ट्रीब्यूट करना चाहती है। उसकी वजह से वो कॉम्प्रोमाइज हो जाते है और आदमी को सीरियल डिहाईड्रेशन और साल्ट हिटेंशन हो सकता है।

5. बाहर जाते समय नमक थोड़ा खाकर जाना चाहिए। चमड़ी में नुकसान हो सकता है, चमड़ी जल भी सकती है सन बर्न कहते है उसको। एलर्जी हो सकती है तो इसलिए आदमी को थोड़ा सावधान रहना चाहिए। बाहर निकलने के लिए अपना प्लान बनाना चाहिए जहां पर जाना है बिना भागे दौड़े, छाते का प्रयोग करें, कैप का प्रयोग करें, इनको पहनकर ही बाहर निकलना चाहिए।
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Sunday, 7 May 2017

आंवला के ऐसे फायदे जो शायद आपको पता नहीं होंगे


आंवला के  ऐसे फायदे जो शायद आपको पता नहीं होंगे 


आंवला 

Family (परिवार): एम्ब्लिका ओफ़्फ़िकिअनिअल (Emblica officinalis)
                इंडियन गूसेबेर्री (Indian Gooseberry)


आंवला के गुण : आंवला में भरपूर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट पाया जाता हैं. और आंवले  में पोटासियम ,कार्बोहायड्रेट ,फाइबर ,प्रोटीन्स ,विटामिन्स ‘ए’,’बी काम्प्लेक्स ,मैग्नीशियम ,विटामिन ‘सी’ ,आयरन,आंवला में विटामिन ‘सी’ भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं.नारंगी से २० % ज्यादा विटामिन ‘सी ‘ होता हैं और इसको गर्म करने पर भी इसकी विटामिन ख़त्म नहीं होते हैं.

आंवला के स्वास्थ सम्बन्धी  फायदे :


 आँखों से सम्बंधित बीमारी के लिए : 
 आंवला का रस आँखों के लिए बहुत फायदेमंद हैं. आंवला आँखों की दृष्टी को या ज्योति को बढाता हैं. मोतियाबिंद में,कलर ब्लाइंडनेस, रतोंधी या कम दिखाई पड़ता हो तो भी आंवला का जूस फायदेमंद हैं. आखों के दर्द में भी काफी फायदा होता हैं.

 मेटाबोलिक क्रियाशीलता को बढाता एवं पाचनक्रिया में मदद करता हैं : 
आंवला मेटाबोलिक क्रियाशीलता को बढाता हैं. मेटाबोलिज्म क्रियाशीलता से हमारा शरीर स्वस्थ और सुखी होता हैं. आवला भोजन को पचाने में बहुत मददगार साबित होता हैं खाने में अगर प्रतिदिन आवले की चटनी, मुरब्बा ,अचार ,रस, चूर्ण या चवनप्रास कैसे भी रोजमरा की जिन्दगी में शामिल करना चाहिए. इससे कब्ज की शिकायत दूर होती हैं पेट हल्का रहता हैं.रक्त की मात्रा में बढ़ोतरी होती हैं.खट्टे ढकार आना ,गैस का बनाना ,भोजन का न पचना ,इत्यादि में आवला के ५  ग्राम पाउडर को पानी ,इ भिगों कर सुबह शाम ले. अम्लीय पित्त के बुरे प्रभाव से छुटकारा मिलता हैं.

 डायबिटिक के लिए :
 आवला में क्रोमियम तत्व पाया जाता हैं जो डायबिटिक के उपयोगि होता हैं. आवला इंसुलिन होरमोंस को को सुदृढ़ करता हैं और खून में सुगर की मात्रा को नियंत्रित करता हैं. क्रोमियम बीटा ब्लॉकर के प्रभाव को कम करता हैं, जो की ह्रदय के लिए अच्छा होता हैं ह्रदय को स्वस्थ बनाता हैं.आवला खराब कोलेस्ट्रोल को ख़त्म कर अच्छे कोलेस्ट्रोल को बनाने में मदद करता हैं. आवला के रस में शहद मिलाकर लेने से डायबिटिक वालोन को बहुत फायदा होता हैं.

 महावारी में समस्या :
  महिलाओं में महावरी की समस्या आम होती जा रही हैं. माहवारी का देर से आना ,ज्यादा रक्तस्त्राव होना,जल्दी जल्दी आना,कम आना , पेट में दर्द का होना,ऐसी कई समस्यां होती रहती हैं.एसं सबके लिए आवला का सेवन फायदेमंद होता हैं.आवला में मिनिरल्स ,विटामिन्स पाया जाता हैं जो महावारी में बहुत आराम दिलाता हैं.अगर आवला का सेवन नियमित किया जाये तो महावारी की समस्याओ से छुटकारा मिलता हैं .महिलाओं में प्रजनन क्षमता को बढ़ाती हैं .

 प्रजनन सम्बन्धी समश्याओं में लाभकारी :
 आंवला प्रजनन के लिए बहुत ही उत्तम हैं महिलाओ और पुरुषो के लिए आंवला के सेवन से पुरुषो में शुक्राणु की क्रियाशीलता और मात्रा बढती हैं और महिलाओं में अंडाणु अच्छे और स्वस्थ बनते हैं, माहवारी नियमित हो जाती हैं.
 हड्डियों के लिए उत्तम : 
आंवला के सेवन से हड्डियाँ मजबूत और ताकत मिलती हैं. आंवला के सेवन से ओस्ट्रोपोरोसिस और आर्थराइटिस एवं जोरो के दर्द में भी आराम दिलाती हैं.

 तनाव से छुट्टी :
आमला के सेवन से तनाव में आराम मिलता हैं अच्छी नींद आती हैं.आवला के तेल को बालों के जड़ों में लगाया जाये तो कलर ब्लाइंडनेस से छुटकारा मिलता हैं.सर को ठडा रखता हैं.और राहत देता हैं.

 संक्रमण से बचाव : 
आंवला में बक्टेरिया और फंगस से लड़ने की क्षमता होती हैं और ये बाहरी बीमारियों से भी हमें बचाती हैं. आंवला शरीर को पुष्ट कर उसे रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाती हैं, और टोक्सिन को यानी विषाक्त प्रदार्थ को हमारे शरीर से निकलती देती हैं. आंवला अल्सर,अल्सरेटिव,कोलेटीस,पेट में संक्रमण ,जैसे विकार को  खत्म करता हैं. आंवला का रस या पाउडर प्रतिदिन लेने से बहुत फायदा होता हैं.


 मूत्र विकारो से छुटकारा दिलाता हैं :
 मुत्र विकारों में आंवला का चूर्ण फायदा करता हैं. आंवला के छाल और इसकी पत्तीयों को पानी में उबाल कर छान ले और उसका सेवन करे बहुत फायदा होता हैं. किडनी में होने वाले संक्रमण को भी खत्म करता हैं. किडनी में होने वाले पत्थर से भी छुटकारा दिलाता हैं.

 वजन कम करने में : 
आंवला के रस का सेवन करने से वजन कम करने में मदद मिलती हैं. आमला हमारे मेटाबोलिज्म को तेज कर वजन कम करने में मदद करती हैं. आंवला के सेवन से भूख कम लगती हैं और काफी देर तक पेट भरा हुआ रहता हैं.

 नकसीर के लिए :
 अगर किसी को नकसीर की तकलीफ हैं तो उन्हें आवला का सेवन करता फायदेमंद होता हैं.ताज़ा रस ३ ,४ चम्मच का सेवन करना चाहिए ,या १ ग्राम चूर्ण  को ५० मिलिग्राम पानी के साथ लेना चाहिए.नाक से खून आने की आदत से आराम मिलता है.

 ह्रदय की समस्या से उबारता हैं :
 आवला हमारे ह्रदय के मांसपेशियों के लिए उत्तम होता हैं.आमला हमारे ह्रदय को स्वस्थ बनाने में कारगर हैं.आमला ह्रदय की नालिकाओ में होने वाली रुकावट को ख़त्म करता हैं.खराब कलेस्ट्रोल को ख़त्म कर अच्छे कलेस्ट्रोल को बनाने में मदद करता हैं..आवला में एंटी ऑक्सीडेंट तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैं. जो शरीर में फ्री रेडिकल को बनाने ही नहीं देता .एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में एमिनो एसिड और पेक्टिन पाए जाते हैं.जो की कलेस्ट्रोल को नहीं बनाने देता हैं और ह्रदय की मांशपेशियों को मजबूती देता हैं.आवला का रस प्रतिदिन सेवन करता लाभप्रद हैं.आवले को किसी भी रूप में आप ले सकते हैं.

 उग्रता व उतेजना में शांति दिलाता हैं :
 आंवला  के सेवन से हमेशा आने वाले उतेजना से शांति मिलती हैं,अचानक से पसीना आना ,गर्मी लगना ,धातु के रोग, प्रमेय ,प्रदर, बार बार कामुक विचार का आना इत्यादि चीजों से आराम दिलाता हैं.

 बबासीर में आराम दिलाता हैं :
 आवले के रस से बबासीर ठीक हो जाता हैं.

  कुष्ट रोग :
  आवला के रस का सेवन फायदेमंद होता हैं.

  उल्टी या वमन के लिए लाभकारी : 
आवला का पाउडर और शहद सेवन क

 रोग प्रतिरोध : 
आंवले में एंटी ओक्सिडेंट होते हैं जो शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाता है और ये मौसम में होने वाले बदलाव के कारन होने वाले वाइरल संक्रमण से भी बचाता है.

आंवला  के बारे में कितना भी कहा जाये बहुत कम ही हैं. १०० रोगों की एक दवा हैं,  आंवला को दो तरीके से खाते हैं  ताज़ा और सुखा आवला चूर्ण ,दोनों ही रूप में आंवला उतना ही फायदेमंद हैं. आंवला बसंत के मौसम में फलते हैं.   आंवला का उपयोग सदियों से चला आ रहा हैं. सदियों पहले चरक ऋषि ने इसकी महत्ता बताई थी, आंवले  के उपयोग से हम हमेशा जवान और सुंदर व स्वस्थ शरीर वाले होते हैं.  आंवला सभी रोगों का अचूक औषधि हैं. आयुर्वेद में आंवला के  उपयोग की महत्ता हैं. आंवला का रसायन भी बाज़ार में मिलता हैं. बाज़ार में आंवला का पाउडर ,चूर्ण ,सुखाया हुआ, आंवला का रस सभी प्रकार का उपलब्ध हैं. आवला का मुरब्बा स्वस्थ की दृष्टी से उत्तम हैं, इसे मौसम के चले जाने के बाद भी उपयोग में ला सकते हैं.पाउडर का उपयोग भी लाभप्रद होता हैं. आवला का अचार भी बहुत फायदे करता हैं, आंवला किसी भी रूप में उतना ही फायदा करता हैं जितना की ताज़ा .